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गोरखपुर

भगवान बिम्ब और जीव प्रतिबिम्ब: राघव ऋषि

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घघसरा में श्रीमद्भागवत कथा का चतुर्थ दिवस, भक्ति और प्रवचन से भावविभोर हुए श्रद्धालु

गोरखपुर। नगर पंचायत घघसरा बाजार के मेन मार्केट स्थित राधा कृष्ण मैरेज वाटिका में स्वर्गीय नेबूलाल जी की पुण्यस्मृति में अग्रहरि परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति रही। कार्यक्रम में पूज्य राघव ऋषि जी के सानिध्य में कथा का विस्तार हुआ, जिसमें भक्ति, आस्था और जीवन दर्शन पर विस्तृत प्रकाश डाला गया।

इस दौरान पूज्य ऋषि जी के एकमात्र सुपुत्र सौरभ ऋषि ने “सब हो जाए भव से पार लेकर नाम तेरा” भजन प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और कई लोग भक्ति में लीन होकर भावनृत्य करने लगे। कथा के क्रम में हिरण्यकश्यप और भक्त प्रहलाद के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया गया कि अहंकार का अंत निश्चित है, जबकि सच्ची भक्ति ही जीवन को सार्थक बनाती है।

प्रवचन में नवधा भक्ति—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवा, अर्चना, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—का महत्व बताते हुए कहा गया कि इन नौ प्रकार की भक्ति से भगवान प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से जीवन सफल होता है। आगे बताया गया कि भक्त प्रहलाद की अटूट श्रद्धा के कारण भगवान नृसिंह काष्ठ स्तंभ को चीरकर प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप का वध कर धर्म की स्थापना की।

पूज्य राघव ऋषि जी ने अपने प्रवचन में कहा कि जो व्यक्ति ‘मेरा-मेरा’ करता है, उसका अंत विनाश में होता है, जबकि ‘तेरा-तेरा’ कहने वाला भगवान की कृपा से पार हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन में मरना या तरना जीव के अपने हाथ में है और अहंकार का अंत केवल भगवान ही कर सकते हैं।

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वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान समय के अनुसार 23 वर्ष तक ब्रह्मचर्य, 40 वर्ष तक गृहस्थ, 50 वर्ष तक वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यास आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। उन्होंने ब्रह्मचर्य को वृद्धि, गृहस्थ को क्षय, वानप्रस्थ को संयम के माध्यम से शक्ति अर्जन तथा संन्यास को त्याग का प्रतीक बताया और कहा कि यह व्यवस्था मनुष्य को क्रमशः ईश्वर के निकट ले जाने का मार्ग है।

कार्यक्रम में सहजनवां के विधायक प्रदीप शुक्ल, नगर पंचायत अध्यक्ष प्रभाकर दूबे तथा भाजपा नेता कृष्णमोहन कसौधन सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। पोथी पूजन एवं व्यास पूजन मुख्य यजमान सुभावती देवी द्वारा सपरिवार विधि-विधान से सम्पन्न कराया गया। इस अवसर पर अशोक अग्रहरि, रविन्द्र अग्रहरि, अरविंद अग्रहरि, पन्नेलाल, रामशब्द, रामजीत और नन्दन अग्रहरि सहित अनेक लोग मौजूद रहे।

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