गाजीपुर
मानसून में देरी से धान की खेती पर संकट, किसानों को वैकल्पिक फसलों की सलाह
बहरियाबाद (गाजीपुर)। समय पर मानसून नहीं आने से क्षेत्र में धान की खेती संकट के दौर से गुजर रही है। धान की बुवाई का समय धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और किसानों द्वारा तैयार की गई धान की नर्सरी (बेहन) पीली पड़कर सूखने लगी है। भीषण गर्मी और वर्षा के अभाव ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में कृषि विशेषज्ञ कम पानी में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा देने वाली वैकल्पिक फसलों की खेती अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल संकट, गिरते भूजल स्तर और बढ़ती बिजली खपत को देखते हुए पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव समय की आवश्यकता है। धान की अपेक्षा कम पानी वाली फसलें पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक हो सकती हैं।
किसानों को बाजरा, ज्वार और रागी (मड़ुआ) जैसी मोटे अनाज की फसलें अपनाने की सलाह दी जा रही है। इसके अलावा अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें भी कम सिंचाई में तैयार हो जाती हैं। इन फसलों की जड़ें वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता भी कम हो जाती है।
इसी प्रकार सरसों, तिल, मूंगफली और सूरजमुखी जैसी तिलहनी फसलें भी कम पानी में अच्छी पैदावार देती हैं। भारत में खाद्य तेलों की लगातार मांग के कारण इन फसलों के अच्छे दाम मिलने की संभावना रहती है। वहीं मक्का भी धान की तुलना में कम पानी में तैयार होने वाली लाभकारी फसल है, जिसका उपयोग खाद्य पदार्थों, पशु चारे तथा औद्योगिक उत्पादों जैसे इथेनॉल और स्टार्च के निर्माण में होता है।
कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ जैसी योजनाओं के तहत धान के स्थान पर अन्य फसलें उगाने वाले किसानों को प्रति एकड़ 7,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती है। कई राज्य सरकारें वैकल्पिक फसलों के बीजों पर सब्सिडी तथा फसल बीमा जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध करा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि धान की खेती पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि यह देश की खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि कम वर्षा और जल संकट वाले क्षेत्रों में फसल विविधीकरण अपनाकर किसान पानी की बचत करने के साथ खाद, डीजल और सिंचाई पर होने वाले खर्च को कम कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में “कम पानी, अधिक मुनाफा” वाली खेती ही किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है।
