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गोरखपुर

एमएमएमयूटी के शोधकर्ताओं को औद्योगिक गंदे पानी की सफाई की पर्यावरण-अनुकूल तकनीक पर भारतीय पेटेंट

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सूर्य के दृश्य प्रकाश से विषैले रंगों को करेगा निष्प्रभावी, जल प्रदूषण नियंत्रण और ग्रीन केमिस्ट्री को मिलेगा बढ़ावा

प्रो. राजेश कुमार यादव के निर्देशन में विकसित तकनीक को भारत सरकार ने दी मान्यता

गोरखपुर। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी), गोरखपुर के शोधकर्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण और हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन की एक नवीन एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को भारत सरकार ने भारतीय पेटेंट प्रदान किया है। यह तकनीक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को कम लागत और कम ऊर्जा में अधिक प्रभावी ढंग से शुद्ध करने में सक्षम है।

8 जुलाई 2026 को प्रदान किए गए इस पेटेंट का शीर्षक “चिटोसान–ZSM-5 बायोकॉम्पोजिट फोटोकैटलिस्ट (Chitosan–ZSM-5 Biocomposite Photocatalyst)” है। इसका विकास विश्वविद्यालय के रसायन एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. राजेश कुमार यादव के निर्देशन में पीएचडी शोधार्थी गीता श्रीवास्तव तथा शोधकर्ताओं डॉ. रेहाना शाहिन, कंचन शर्मा और शैफाली मिश्रा ने किया है।

यह अत्याधुनिक तकनीक सूर्य के दृश्य प्रकाश (Visible Light) का उपयोग कर औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद विषैले रंगों (डाई) को कम हानिकारक पदार्थों में परिवर्तित करती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संचालन के लिए अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ऊर्जा की बचत होती है और उपचार की लागत भी कम आती है।

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शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक केवल औद्योगिक गंदे पानी की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि रासायनिक और औषधि उद्योगों में उपयोग होने वाले सल्फाइड यौगिकों के चयनात्मक ऑक्सीकरण में भी उपयोगी है। इससे स्वच्छ, सुरक्षित और ऊर्जा-कुशल रासायनिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा मिलेगा।

इस बायोकॉम्पोजिट फोटोकैटलिस्ट में प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त चिटोसान तथा विशेष संरचना वाले ZSM-5 पदार्थ का उपयोग किया गया है। दोनों के संयोजन से तैयार यह तकनीक जल प्रदूषण नियंत्रण, ग्रीन केमिस्ट्री, स्वच्छ प्रौद्योगिकी तथा सतत विकास (Sustainable Development) के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह नवाचार कपड़ा, चमड़ा, कागज और रासायनिक उद्योगों से निकलने वाले विषैले रंगों को प्रभावी ढंग से नष्ट करने के साथ-साथ फार्मास्यूटिकल और फाइन केमिकल उद्योगों की उत्पादन प्रक्रियाओं को भी अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाएगा।

विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई देते हुए कहा कि यह पेटेंट विश्वविद्यालय में विकसित मजबूत शोध संस्कृति, आधुनिक अनुसंधान सुविधाओं और नवाचार को निरंतर प्रोत्साहन देने का परिणाम है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य ऐसी तकनीकों का विकास करना है, जिनका प्रत्यक्ष लाभ समाज, उद्योग और पर्यावरण को मिले।

उन्होंने विश्वास जताया कि यह तकनीक भविष्य में पर्यावरण संरक्षण, औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रबंधन तथा हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उद्योगों और शोध संस्थानों के साथ सहयोग के नए अवसर प्रदान करेगी।

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