गाजीपुर
सनातन धर्म की कठिन और पवित्र परंपरा है कांवड़ यात्रा
शिवभक्ति में लीन हुए श्रद्धालु
ग्रामीण अंचलों से गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर बढ़ रहे कांवड़िये, पौराणिक कथाओं से जुड़ी है परंपरा
गाजीपुर (बहरियाबाद)। श्रावण मास के आरंभ होते ही बहरियाबाद क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में शिवभक्ति का उत्साह चरम पर है। क्षेत्र के विभिन्न गांवों से कांवड़ियों के जत्थे पवित्र नदियों से गंगाजल भरकर कंधों पर कांवड़ लेकर पैदल शिवालयों की ओर रवाना हो रहे हैं। श्रद्धालु हर-हर महादेव और बोल बम के जयघोष के साथ मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक कर रहे हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनके शरीर में उत्पन्न हुई जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने पवित्र नदियों का जल लाकर उनका अभिषेक किया। इसी घटना को कांवड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण को पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव के परम भक्त रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और विष के प्रभाव को शांत करने के लिए गंगाजल अर्पित किया था। वहीं त्रेतायुग में भगवान परशुराम द्वारा गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर में जलाभिषेक करने की कथा भी कांवड़ यात्रा की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।
श्रवण कुमार की कथा भी इस परंपरा को प्रेरणा देने वाली मानी जाती है। मान्यता है कि उन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को कांवड़ के सहारे तीर्थ यात्रा कराई थी और हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित किया था। तभी से सावन में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा जन-जन में लोकप्रिय होती चली गई।
श्रद्धालुओं का कहना है कि कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलने की यात्रा नहीं, बल्कि अनुशासन, संयम, तप, सेवा और आस्था का प्रतीक है। कांवड़िये पूरे मार्ग में सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और भगवान शिव की भक्ति में लीन होकर अपनी यात्रा पूरी करते हैं। सावन के दौरान क्षेत्र के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है और पूरा वातावरण शिवमय बना हुआ है।
