वाराणसी
संस्कृत विश्वविद्यालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय के बीच ऐतिहासिक एमओयू
जनजातीय युवाओं के लिए शुरू होंगे प्रमाणपत्र व डिप्लोमा पाठ्यक्रम, शिक्षा के साथ कौशल विकास पर जोर
कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा बोले— विकसित भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा समझौता
वाराणसी। जनजातीय समाज के शैक्षिक, सांस्कृतिक और कौशल विकास को नई गति देने के उद्देश्य से जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के बीच बुधवार को एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के तहत जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट) और डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित किए जाएंगे।

नई दिल्ली स्थित जनजातीय कार्य मंत्रालय में आयोजित समारोह में मंत्रालय की सचिव रंजना चोपड़ा, संयुक्त सचिव अनन्त प्रकाश पाण्डेय, निदेशक दीपाली मसीर्कर तथा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा की उपस्थिति में एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।
समझौते के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के मानकों के अनुरूप ऐसे पाठ्यक्रम विकसित किए गए हैं, जिनमें जनजातीय समाज की संस्कृति, मातृभाषा, पारंपरिक ज्ञान और जीवन मूल्यों के संरक्षण के साथ आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास, व्यक्तित्व निर्माण और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण का समावेश किया गया है।
कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यह समझौता जनजातीय समाज के उज्ज्वल भविष्य और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से जनजातीय युवाओं में आत्मनिर्भरता, नेतृत्व क्षमता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रबोध की भावना का विकास होगा।
उन्होंने कहा कि यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की मूल भावना के अनुरूप शिक्षा को स्थानीय संस्कृति, मातृभाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा और कौशल विकास से जोड़ने का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे जनजातीय युवाओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक युग की चुनौतियों का सामना करने में सहायता मिलेगी।
वक्ताओं ने कहा कि यह समझौता केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के समावेशी विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में एक दूरदर्शी राष्ट्रीय पहल है। इसके माध्यम से जनजातीय समुदायों को शिक्षा, कौशल और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे तथा भारतीय ज्ञान परंपरा और जनजातीय विरासत के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण होगा।
