गाजीपुर
शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा, नागरिकों का मौलिक अधिकार
गाजीपुर। भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। लोकतंत्र केवल चुनाव के समय मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की नीतियों पर असहमति व्यक्त करना और अपनी मांगों को शांतिपूर्ण ढंग से सामने रखना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रत्येक नागरिक को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से धरना, प्रदर्शन या जुलूस निकाल सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को लोकतंत्र का अभिन्न अंग माना है। अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2016) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना का हिस्सा है। न्यायालय ने यह भी माना कि नागरिकों को सरकार की नीतियों के प्रति असहमति जताने का अधिकार है।
हालांकि, यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, पथराव, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, एम्बुलेंस, दमकल या आम नागरिकों की आवाजाही में गंभीर बाधा उत्पन्न की जाती है, अथवा भाषण या गतिविधियां देश की संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था या कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बनती हैं, तो ऐसे मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
इस प्रकार, यदि धरना-प्रदर्शन कानून के दायरे में, निर्धारित शर्तों एवं आवश्यक अनुमति के साथ शांतिपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो वह भारतीय संविधान द्वारा संरक्षित लोकतांत्रिक अधिकारों का वैध प्रयोग माना जाता है।
