गाजीपुर
झमाझम बारिश से खेतों में लौटी रौनक, किसानों के चेहरों पर खिली मुस्कान
बहरियाबाद क्षेत्र में धान रोपाई ने पकड़ी रफ्तार, रोपनी गीतों से गूंजे खेत-खलिहान
कीचड़ भरे खेतों में महिलाओं ने निभाई लोक परंपरा, कजरी और रोपनी गीतों से जीवंत हुई ग्रामीण संस्कृति
बहरियाबाद (गाजीपुर)। क्षेत्र में हुई झमाझम बारिश ने किसानों के चेहरे पर मुस्कान लौटा दी है। कई घंटों तक हुई लगातार वर्षा से खेत पानी से लबालब हो गए हैं, जिससे धान की रोपाई का कार्य तेज़ी से शुरू हो गया है। किसान पूरे उत्साह के साथ खेतों में जुटे हैं, जबकि महिलाएं पारंपरिक रोपनी गीत गाते हुए धान की रोपाई कर रही हैं।
धान की रोपाई के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीत भारतीय कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवन की समृद्ध लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी अंचल में इन्हें ‘रोपनी गीत’ या ‘हरी कजरी’ के नाम से जाना जाता है। घंटों तक कीचड़ और पानी में खड़े होकर किए जाने वाले इस कठिन श्रम को ये गीत सहज और आनंदमय बना देते हैं।
गीतों की मधुर लय के साथ महिलाओं के हाथ एक समान गति से चलते हैं, जिससे रोपाई का कार्य तेजी और तालमेल के साथ पूरा होता है। इन लोकगीतों में खेती-किसानी के साथ-साथ ग्रामीण जीवन की संवेदनाएं, रिश्तों की मिठास, सास-बहू की नोकझोंक, ननद-भाभी की हंसी-ठिठोली, परदेस गए पिया की याद और इंद्र देव से अच्छी वर्षा की प्रार्थना का सुंदर चित्रण मिलता है।
खेतों में गूंजते गीत—”बरसहु न हे इंद्र देव, झमकि-झमकि…” और “धान के रोपनिया रोपे तनी गोरी, भींजेला सगरो बदनवां…”—ने पूरे वातावरण को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया। वहीं काली घटाओं, चमकती बिजली और भीगी मिट्टी की सोंधी खुशबू ने ग्रामीण अंचल की प्राकृतिक सुंदरता को और भी मनमोहक बना दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि अच्छी बारिश से इस वर्ष धान की फसल बेहतर होने की उम्मीद जगी है। बारिश ने जहां किसानों को राहत दी है, वहीं खेतों में गूंजते रोपनी गीतों ने भारतीय लोक संस्कृति की जीवंत परंपरा को एक बार फिर सजीव कर दिया है।
