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वाराणसी

आखिर क्यों सावन में भी नहीं खुलते पितामहेश्वर मंदिर के कपाट

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वाराणसी। शिव की नगरी काशी रहस्यों और दिव्यता का अद्भुत संगम है। इसी शहर में स्थित है पितामहेश्वर शिवलिंग, जो काशी के हृदय में होते हुए भी सामान्य दृष्टि से ओझल है। यह स्वयंभू शिवलिंग भगवान शिव के पिता के प्रतीक के रूप में पूजित है। सबसे विशेष बात यह है कि पितामहेश्वर मंदिर साल भर बंद रहता है और केवल महाशिवरात्रि के दिन ही इसके कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। सावन जैसे प्रमुख माह में भी यहां दर्शन की अनुमति नहीं मिलती।। सावन जैसे प्रमुख माह में भी यहां दर्शन की अनुमति नहीं मिलती।

पितामहेश्वर मंदिर की संरचना किसी सामान्य मंदिर जैसी नहीं है। यह मंदिर जमीन से लगभग 30 से 40 फीट नीचे स्थित है। यहां जाने के लिए कोई सीढ़ी नहीं है बल्कि एक संकरी सुरंगनुमा सुराख से ही नीचे झांककर दर्शन किए जाते हैं। श्रद्धालु यहां झुककर या बैठकर भगवान का दर्शन करते हैं, जिससे उनके मन में अद्भुत विनम्रता और आत्मसमर्पण का भाव जागृत होता है। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव भी इस स्थान को आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं।

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यह गुप्त और गहन आध्यात्मिक स्थल पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्मों से भी जुड़ा है। इसे पितृ ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। शिव भक्ति में लीन भक्तों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है। यहां आकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे स्वयं शिव के मूल स्रोत के साक्षात्कार कर रहे हों। पितामहेश्वर शिवलिंग काशी की उन चंद रहस्यमयी विरासतों में से एक है, जिनका दर्शन भाग्य और गहन श्रद्धा से ही संभव होता है। यह स्थान न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा का प्रवेशद्वार भी है, जहां जाकर मनुष्य ईश्वर की गहराई और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से सीधा संपर्क महसूस कर सकता है।

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