गाजीपुर
सावन आया, पर पेड़ों पर नहीं पड़े झूले; स्मृतियों में सिमट रही लोक संस्कृति
कभी गांव-गांव गूंजती थी कजरी की तान, पेड़ों की डालियों पर सजते थे रंग-बिरंगे झूले
पेड़ों की कटाई, पलायन और आधुनिक जीवनशैली ने बदली तस्वीर; नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने की जरूरत
भांवरकोल (गाजीपुर)। “सावन का महीना, पवन करे शोर” जैसे सदाबहार गीत सुनते ही हरियाली, बारिश और पेड़ों पर पड़े झूलों की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। सावन आज भी हर वर्ष आता है, बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं और बारिश की फुहारें धरती को भिगोती हैं, लेकिन गांवों में पेड़ों पर पड़ने वाले झूले और महिलाओं की कजरी की मधुर तान अब धीरे-धीरे गायब होती जा रही है।
कभी झूलों से गुलजार रहते थे गांव
करीब दो दशक पहले तक सावन शुरू होते ही गांवों और मोहल्लों का माहौल बदल जाता था। नीम, आम, पीपल और बरगद की मजबूत डालियों पर रंग-बिरंगे झूले पड़ जाते थे। युवतियां और महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाकर समूह में झूला झूलतीं और कजरी गाती थीं। सावन की फुहारों के बीच गीत-संगीत और हंसी-ठिठोली गांवों को उत्सव में बदल देती थी।
बेटियों को रहता था सावन का इंतजार
सावन का महीना पारिवारिक रिश्तों को भी मजबूती देता था। नवविवाहित बेटियां मायके आती थीं और अपनी सखियों के साथ झूला झूलने तथा कजरी गाने का आनंद लेती थीं। विरह और मिलन की भावनाओं से भरे कजरी गीत सावन की खास पहचान हुआ करते थे। अब यह परंपरा भी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है।
पेड़ कटे तो झूले भी हुए गायब
बदलते समय के साथ बाग-बगीचों और विशाल पेड़ों की संख्या घटती गई। जिन डालियों पर कभी झूले पड़ते थे, वहां अब कंक्रीट के मकान दिखाई देते हैं। गांवों में भी पहले जैसी हरियाली और बड़े पेड़ कम होते जा रहे हैं। इसका सीधा असर सावन से जुड़ी लोक परंपराओं पर पड़ा है।
मोबाइल-सोशल मीडिया ने भी बदली जीवनशैली
आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने नई पीढ़ी की दिनचर्या बदल दी है। घर-आंगन में गूंजने वाली कजरी की जगह मोबाइल की धुनों ने ले ली है। संयुक्त परिवारों के बिखराव और रोजगार के लिए युवाओं के पलायन ने भी सामूहिक रूप से मनाए जाने वाले सावन उत्सवों की रौनक कम कर दी है।
नई पीढ़ी को लोक परंपराओं से जोड़ना जरूरी
सावन केवल मौसम नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मेल-मिलाप का उत्सव रहा है। झूले मनोरंजन के साथ प्रकृति से जुड़ाव, प्रेम और सामूहिक जीवन के प्रतीक थे। आवश्यकता है कि वृक्षारोपण और बाग-बगीचों के संरक्षण के साथ विद्यालयों एवं सामाजिक संस्थाओं में कजरी, झूला और सावन उत्सव जैसे आयोजन किए जाएं।
सावन आज भी हरियाली लेकर आता है, बादल आज भी बरसते हैं और हवाएं भी वही हैं। बदला है तो जीवन जीने का अंदाज। यदि लोक संस्कृति और प्रकृति को सहेजने की पहल नहीं हुई तो आने वाली पीढ़ियां सावन के झूले और कजरी की मधुर तान को केवल किताबों, तस्वीरों और पुराने गीतों में ही तलाशेंगी।
