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गाजीपुर

सोशल मीडिया नौजवानों के लिए बना ‘जी का जंजाल’

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रील्स और लाइक्स की आभासी दुनिया बढ़ा रही तनाव, अकेलापन और समय की बर्बादी

साइबर बुलिंग, फ्रॉड और ब्लैकमेलिंग का भी बढ़ रहा खतरा; डिजिटल डिटॉक्स अपनाने की जरूरत

बहरियाबाद (गाजीपुर)। सोशल मीडिया आज युवाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब उनके लिए परेशानी का कारण बनता जा रहा है। बहरियाबाद क्षेत्र के गांवों में भी नौजवानों के बीच सोशल मीडिया की बढ़ती लत को लेकर चिंता दिखाई देने लगी है। रील्स, स्टोरी और फोटो के जरिए आभासी दुनिया में सक्रिय रहने की होड़ युवाओं के मानसिक तनाव और सामाजिक दूरी को बढ़ा रही है।

दूसरों की दिखावटी जिंदगी से तुलना

सोशल मीडिया पर लोग आमतौर पर अपनी जिंदगी के बेहतर पलों को ही साझा करते हैं। ऐसे में युवा दूसरों की तस्वीरों और वीडियो से अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना करने लगते हैं। इससे उनमें हीनभावना, पीछे छूटने का डर और तनाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पोस्ट पर लाइक्स और कमेंट्स की संख्या भी कई युवाओं के लिए खुशी और तनाव का पैमाना बनती जा रही है।

रील्स की लत से पढ़ाई और करियर प्रभावित

रील्स और शॉर्ट वीडियो लगातार देखने की आदत युवाओं का कीमती समय और ध्यान दोनों प्रभावित कर रही है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने और लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने से पढ़ाई या किसी गंभीर विषय पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस हो सकती है। इसका असर उनकी एकाग्रता और करियर पर भी पड़ रहा है।

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साइबर बुलिंग और फ्रॉड का खतरा

सोशल मीडिया पर पहचान छिपाकर ट्रोलिंग, भद्दे कमेंट और साइबर बुलिंग करना आसान हो गया है। वहीं निजी जानकारी, फोटो या अन्य संवेदनशील सामग्री साझा करने से साइबर फ्रॉड और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी बढ़ जाता है। युवाओं को सोशल मीडिया इस्तेमाल करते समय अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करने में सावधानी बरतने की जरूरत है।

आभासी दोस्ती के बीच बढ़ रहा अकेलापन

सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स और ऑनलाइन दोस्त होने के बावजूद वास्तविक जीवन में युवाओं का सामाजिक जुड़ाव कम होता जा रहा है। परिवार के साथ समय बिताने के बजाय मोबाइल में व्यस्त रहना आम होता जा रहा है। इससे आभासी जुड़ाव के बावजूद अकेलेपन की भावना बढ़ सकती है।

सोशल मीडिया स्वयं में खराब नहीं है, बल्कि उसका अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल समस्या बनता है। युवाओं को डिजिटल डिटॉक्स, सीमित स्क्रीन टाइम और वास्तविक जीवन के रिश्तों, पढ़ाई, स्वास्थ्य तथा करियर पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

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