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आठवीं मोहर्रम पर निकले जुलूस में जंजीरी मातम बना आकर्षण का केंद्र

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बहरियाबाद में मातमी जुलूस के दौरान बड़ी संख्या में जुटे श्रद्धालु और दर्शक

कर्बला के शहीदों की याद में किया गया पारंपरिक मातम

बहरियाबाद (गाजीपुर)। आठवीं मोहर्रम के अवसर पर बहरियाबाद क्षेत्र में निकले अलम के जुलूस के दौरान किए गए जंजीरी मातम ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मातमी जुलूस में शामिल अकीदतमंदों ने कर्बला के शहीदों की याद में पारंपरिक तरीके से शोक व्यक्त किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि

मोहर्रम इस्लामी इतिहास की उस महत्वपूर्ण घटना की याद दिलाता है, जब 680 ईस्वी (61 हिजरी) में इराक के कर्बला मैदान में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहादत प्राप्त की थी। मोहर्रम के दौरान विशेष रूप से शिया समुदाय के लोग उनकी याद में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों और मातमी आयोजनों में भाग लेते हैं।

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शोक और समर्पण की परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जंजीरी मातम कर्बला की घटना में हुए दुख और बलिदान को स्मरण करने का एक प्रतीकात्मक माध्यम माना जाता है। मातमी जुलूस में शामिल लोग इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी को याद करते हुए अपने श्रद्धा भाव का प्रदर्शन करते हैं।

अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश

धार्मिक विद्वानों के अनुसार कर्बला की घटना केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। मोहर्रम के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को अन्याय, अत्याचार और तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष तथा मानव मूल्यों की रक्षा का संदेश भी दिया जाता है।

शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ कार्यक्रम

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बहरियाबाद में आयोजित मातमी जुलूस और अन्य धार्मिक कार्यक्रम शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुए। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर स्थानीय प्रशासन भी सतर्क रहा और पूरे कार्यक्रम के दौरान स्थिति सामान्य बनी रही।

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