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जौनपुर

मुहर्रम में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल, हिंदू अजादार भी निभा रहे परंपरा

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जौनपुर में कर्बला की याद में साझा सांस्कृतिक एकता का अनूठा दृश्य

जौनपुर।मुहर्रम के पवित्र महीने में जौनपुर की गंगा-जमुनी तहजीब एक बार फिर सामाजिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल पेश कर रही है। हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के 71 शहीदों की याद में आयोजित अजादारी कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में हिंदू परिवार भी श्रद्धा के साथ भाग ले रहे हैं।

दस दिनों तक चलने वाले इन आयोजनों में दोनों समुदायों के लोग मिलकर अमन, इंसानियत और भाईचारे का संदेश दे रहे हैं। दसवीं मुहर्रम के अवसर पर सदर इमामबाड़ा में विशेष दृश्य देखने को मिलता है, जहां हिंदू अजादार भी ताजियों के साथ कर्बला तक पहुंचते हैं।

अहियापुर निवासी सूरज साहू ने बताया कि उनके परिवार की यह परंपरा लगभग 25 वर्षों से चली आ रही है। उनके अनुसार, बचपन में उनके पिता द्वारा मांगी गई मन्नत पूरी होने के बाद से परिवार लगातार मुहर्रम की अजादारी में शामिल होता है। परिवार के सदस्य काले वस्त्र धारण कर नंगे पांव रहते हुए शबीहे तुर्बत और ताबूत को अकीदत के साथ उठाते हैं।

इसी तरह सैदनपुर निवासी एवं पंजाब नेशनल बैंक के सेवानिवृत्त प्रबंधक ज्ञान कुमार भी वर्षों से मुहर्रम की परंपरा निभा रहे हैं। उनके घर पर दस दिनों तक ताजिया रखा जाता है और प्रतिदिन मजलिस व मातम का आयोजन होता है। 11वीं मुहर्रम को उनके आवास से शबीहे ताबूत, अलम और दुलदुल का जुलूस निकाला जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में हिंदू अजादार शामिल होते हैं।

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ज्ञान कुमार ने हजरत इमाम हुसैन के जीवन और कर्बला की घटना पर आधारित ‘दास्ताने कर्बला’ नामक पुस्तक भी लिखी है। वे कर्बला की जियारत भी कर चुके हैं। उनका कहना है कि इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर सत्य और इंसानियत का जो संदेश दिया, वह पूरी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है।

अहियापुर इमामबाड़े में प्रतिदिन शाम के समय मजलिस का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होकर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। नौहा और मातम के माध्यम से शहीदों को याद किया जाता है।

इस परंपरा के तहत हिंदू अजादारों ने ‘फिदाये हुसैन’ नाम से एक अंजुमन भी बनाई है, जिसके सदस्य मुहर्रम के दौरान नौहा, मातम और जुलूसों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। दसवीं मुहर्रम को ये सदस्य ताजियों को सिर पर उठाकर सदर इमामबाड़ा स्थित कर्बला तक ले जाते हैं, जहां उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है।

यह परंपरा जौनपुर में हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी मिसाल के रूप में देखी जाती है।

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