गाजीपुर
सावन की फुहारों संग सजने लगे झूले, गूंजने लगी कजरी की तान
बाग-बगीचों में बढ़ी रौनक, हरियाली के बीच झूलन उत्सव की तैयारियां तेज
बहरियाबाद (गाजीपुर)। सावन माह के आगमन के साथ ही बहरियाबाद और आसपास के ग्रामीण अंचलों में झूलन उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। बाग-बगीचों और घर-आंगन में झूले डालने की हलचल तेज हो गई है। सबसे अधिक उत्साह बच्चों और युवतियों में देखने को मिल रहा है, जो हरियाली और रिमझिम बारिश के बीच झूला झूलने का इंतजार कर रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में सावन के महीने में झूला झूलने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी वृंदावन में कदंब के पेड़ों पर झूला झूलते थे। आज भी मथुरा, वृंदावन और ब्रज क्षेत्र के मंदिरों में सावन के दौरान झूलन उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पौराणिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था और सावन माह में ही उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। इसी खुशी में झूला झूलने और उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई। उत्तर भारत में हरियाली तीज और सावन के अवसर पर नवविवाहित बेटियां मायके आती हैं। इस दौरान महिलाएं और युवतियां आम, नीम और बरगद के पेड़ों पर झूले डालकर कजरी और मल्हार जैसे लोकगीत गाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों पारंपरिक कजरी की गूंज सुनाई देने लगी है
“अरे रामा! झूला तो पड़ गए अमवा के डार पर, झूले राधा प्यारी रे हरि…”
लोकगीतों में सावन की फुहार, सखियों का साथ, मायके की यादें और प्रेम की भावनाएं जीवंत हो उठती हैं। बुजुर्गों का कहना है कि झूला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, खुले वातावरण में झूला झूलने से मानसिक तनाव कम होता है, शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा हाथ, पैर और शरीर की मांसपेशियों का स्वाभाविक व्यायाम भी होता है। इसी कारण सावन का झूलन उत्सव आज भी गांवों की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है।
