गाजीपुर
कर्बला की धरती पर पहुँचा इमाम हुसैन का काफिला
मोहर्रम की दूसरी तारीख का इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व
कर्बला में डेरा डालने के साथ शुरू हुआ शहादत के सफर का अंतिम पड़ाव
बहरियाबाद (गाज़ीपुर)। मोहर्रम की दूसरी तारीख (2 मोहर्रम, 61 हिजरी) का इतिहास और इस्लाम में बहुत बड़ा महत्व है। यही वह ऐतिहासिक दिन है जब हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला की सरज़मीन पर पहुँचे थे।
हज़रत इमाम हुसैन मक्का से कुफ़ा की तरफ जा रहे थे, लेकिन यज़ीद की फ़ौज के कमांडर हुर इब्ने यज़ीद रियाही ने उनका रास्ता रोक दिया था। हुर को हुक्म था कि वह इमाम को ऐसी जगह रुकने पर मजबूर करे जहाँ पानी और कोई पनाह (किला) न हो। 2 मोहर्रम को इमाम का काफिला कर्बला पहुँचा।
घोड़े के रुकने का उल्लेख
कहा जाता है कि जब इमाम हुसैन का काफिला इस जगह पहुँचा, तो इमाम का घोड़ा वहीं रुक गया और उसने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। इमाम ने जब दूसरा घोड़ा बदला, तो वह भी आगे नहीं बढ़ा। इस तरह इमाम ने सात घोड़े बदले, लेकिन कोई भी आगे नहीं बढ़ा।
इमाम हुसैन ने अपने साथियों से उस जगह का नाम पूछा। साथियों ने अलग-अलग नाम बताए—अकर (तबाही), नैनवा और ग़ादरिया। आखिर में जब एक साथी ने कहा कि इस जगह को “कर्बला” भी कहते हैं, तो इमाम हुसैन की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने फरमाया, “यह ‘करब’ (दुख) और ‘बला’ (मुसीबत) की जगह है। खुदा की कसम, यही हमारे रुकने की जगह है, यही हमारा खून बहाया जाएगा और यहीं हमारी कब्रें बनेंगी।”
इसके बाद इमाम हुसैन ने अपने भाई हज़रत अब्बास (अ.स.) को हुक्म दिया कि इसी तपती रेत पर काफिले के खैमे (टेंट) लगा दिए जाएँ।
आशूरा तक जारी रहा संघर्ष
यह वह दिन था जब कर्बला के उस ऐतिहासिक और दर्दनाक सफर का अंतिम पड़ाव शुरू हुआ, जिसका अंत 10 मोहर्रम (आशूरा) को इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत के साथ हुआ।
मोहर्रम की मजलिसों में 2 तारीख को इमाम हुसैन के कर्बला पहुँचने और बीवी ज़ैनब (स.अ.) के दिल में भाई की शहादत को लेकर पैदा हुए अंदेशे और दुख का विशेष रूप से ज़िक्र किया जाता है।
मोहर्रम की पहली तारीख से ही मजलिसें (धार्मिक सभाएं) शुरू हो जाती हैं, जिनमें कर्बला के शहीदों की दास्तान सुनाई जाती है।
