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योग-वियोग में समत्व-भाव ही योग है- स्वामी अड़गड़ानन्द महाराज

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मन में श्रीकृष्ण रहेंगे तो जीवन संग्राम में पराजय हो नहीं सकता-महाराज

110 दिन बाद लौटे 94 वर्षीय स्वामी जी का भक्तों के बीच उद्बोधन

हास्य शैली में कहा-‘मशीनों से जवान हो गए हैं

नारद महाराज लट्टू जैसे दौड़ते-भागते दिखे

रिपोर्ट : मनोकामना सिंह

मिर्जापुर। योग दिवस पर समाराहों और मंचों पर बैठकर विविध आसन और व्यायाम की क्रियाएँ भले चतुर्दिक होती रहीं वही चुनार स्थित शक्तेशगढ़ आश्रम में योग की मूल-भावना को व्याख्यायित करते ‘यथार्थ-गीता’ के प्रणेता स्वामी अड़गड़ानन्द महाराज साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण’ का दर्शन अपने उद्बोधनों के जरिए करा रहे थे। वे योग की पराकाष्ठा ‘संयोग-वियोग’ में समत्व की स्थिति में ही योगेश्वर श्रीकृष्ण के प्रकटीकरण का रास्ता दिखा रहे थे। उनका कहना था कि हमारे और परमात्मा के बीच की तरंगों से मन के निष्प्रभावी होने का नाम ही योग है। इसके लिए किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा हमारे में बीजारोपण नहीं हो सकता जब तक हम खुद इस दिशा में सजग नहीं होंगे।

मन ही शत्रु और मन ही मित्र

अत्यंत सरल तरीके से श्रीकृष्ण के अति गूढ़ उपदेशों को समझाते हुए महाराज ने कहा कि बाहरी शत्रु और मित्र नहीं होते, सिर्फ मन ही ऐसा है जो इन दोनों भावों में रहता है। इंद्रियों के जरिए शत्रुभाव और सखाभाव जागृत होता है। अर्जुन के मन में इसी सखाभाव को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जागृत कर दिया। लिहाज़ा महासंग्राम में बड़े-बड़े विजातीय योद्धाओं को अर्जुन ने दृढ़-संकल्पों के बाण से आहत ही नहीं बल्कि मार डाला।

आत्मबल मजबूत करना चाहिए

उन्नत जीवन जीने की कला समझाते हुए स्वामी जी ने कहा कि ऐसा कार्य करना ही नहीं चाहिए जिससे आत्मबल कमजोर हो। जिसका आत्मबल सशक्त रहता है, वह बड़ी सी बड़ी विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। विचलित न होना ही श्रीकृष्ण की प्राप्ति है। अर्जुन के विचलन को उन्होंने दूर कर दिया। इसके लिए परमात्मा के अंश हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की गूंज पर ध्याननिष्ठ रहना चाहिए। जो अधोगति और ऊर्ध्वगति दोनों ओर ले जाता है।

यज्ञ क्या है

प्राणायाम के जरिए यज्ञ को परिभाषित करते हुए स्वामी अड़गड़ानन्द ने कहा कि प्राणवायु का अपानवायु में, अपान का प्राण में तथा प्राण एवं अपान को एकाकार कर देना सर्वोत्तम यज्ञ है। फिर तो साधक के व्यक्तित्व से ज्ञान की ज्योति स्वयं प्रस्फुटित होने लगती है। ऐसा व्यक्ति सूर्य-सदृश तेजवान हो जाता है।

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महाराज बीच-बीच मे विनोदभाव में दिखे

मंगलवार, 21 जून को अपराह्न शक्तेशगढ़ आश्रम में लिफ्ट से नीच उतरते जयकारा से आश्रम गूंजने लगा। अंदर ही महाराज कुटिया वाले आश्रम में उद्बोधन के लिए जब विराजे तो सबसे पहले पुरुष भक्तों से पूछा कि मेरी आवाज़ सुनाई पड़ रही है या नहीं ? एक साथ ‘हाँ’ का जवाब होने पर महिलाओं की तरफ़ मुखातिब होकर पूछा-‘माताओं, आवाज़ आ रही है या नहीं?’ उस तरफ़ से भी ‘हां’ का जवाब आया तब महाराज ने जो कहा, उस पर ठहाका लगने लगा।

मशीन ने जवान बना दिया

94 वर्षीय महाराज ने कहा-‘आप सब के ‘हाँ’ के जवाब से मुझे लग रहा है कि मैं जवान ही हूं।’ फिर उन्होंने माइक और लाउडस्पीकर को धन्यवाद दिया कि इन मशीनों ने जवान बना दिया। उनके इस हास्य-प्रसंग के कई अर्थ निकलते दिखाई पड़े। एक तो वैज्ञानिक आविष्कारों की प्रशंसा से भी अर्थ लोग निकालते रहे तो दूसरी ओर मशीनों के बल पर ही चुस्त-दुरुस्त बनने पर भी कटाक्ष के भाव को भी समझा जाता रहा। अपने दो घण्टे से अधिक के प्रवचन में महाराज कई बार बोध-कथाओं के जरिए प्रवचन को सरस कर रहे थे। इसी बीच श्रीकृष्ण-उद्धव और गोपियों के बीच संवाद तथा सूरदास के पद ‘..उद्धव, मन न भए दस-बीच’ की पूरी कथा अत्यंत मनोरम ढंग से उन्होंने सुनाई।

नारद महाराज व्यवस्था में

महाराज के लिफ्ट से उतरने के पहले उनके अत्यंत प्रिय नारद महाराज सारी व्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए लट्टू की तरह नाचते रहे। एक पैर कभी यहाँ तो एक पैर वहां। भक्तों को कोई असुविधा न हो, इसपर उनकी विशेष दृष्टि थी।

नगर के लोगों ने प्रकट की आस्था

नगर से गए आश्रम के सेवक रघुवंश दीक्षित, कार्पेट व्यवसाई उमाकान्त पांडेय, उनके पुत्र गुड्डू, सलिल पांडेय को आश्रम में दो दिनों से मौजूद रामप्रसाद पांडेय (बाबा पांडेय) ने महाराज के समक्ष ले जाकर आशीर्वाद दिलवाया। बाबा पांडेय से आश्रम का कण-कण परिचित-सा दिखाई पड़ा।

अनुशासन का पाठ पढ़ाता आश्रम

तकरीबन 5 हजार से अधिक भक्त अत्यंन्त शांत मुद्रा में शुरू से अंत तक थे। इसी बीच महाराज के सामने कोई युवक एक थाल में प्रसाद लेकर बांटने लगा। माइक से ही महाराज ने निर्देशित किया कि प्रसाद सबको मिलना चाहिए। फिर तो दसियों लोग बड़े अनुशासित ढंग से एक-एक को प्रसाद दिया । कहीं कोई न उतावलापन और न ही शोर-शराबा।

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झाड़ू लगाते रिटायर्ड मजिस्ट्रेट

आश्रम में प्रवेश करते साधु वेश में एक तेजस्वी महात्मा झाड़ू लगा रहे थे। उनका फोटो लेने पर उन्होंने मना किया कि फोटो न लें। क्योंकि वे आत्मिकभाव से ऐसा कर रहे हैं, प्रसिद्धि के लिए नहीं। पता चला कि वे रिटायर्ड ADM हैं।

110 दिन बाद लौटे हैं महाराज

शिवरात्रि, 1 मार्च को वरचर (मध्यप्रदेश) से महाराज 20 जून को लौटे हैं। प्रवचन के बाद घण्टों वे पहाड़ों पर टहलते भी रहे।

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