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वाराणसी

काशी में रथयात्रा मेले की तैयारियां तेज, 60 साल पुराने रथ को मिल रहा नया स्वरूप

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16 जुलाई से शुरू होगा तीन दिवसीय मेला, रथ पर लगेंगे आठ सीसीटीवी कैमरे

1802 से चली आ रही परंपरा, रथ की मरम्मत के साथ दुर्गा पूजा की तैयारियां भी होंगी शुरू

वाराणसी। काशी के ऐतिहासिक रथयात्रा मेले की तैयारियां तेज हो गई हैं। 16 जुलाई से शुरू होने वाले तीन दिवसीय मेले को लेकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विराजमान होने वाले करीब 60 वर्ष पुराने यंत्राकार अष्टकोणीय रथ का मरम्मत और सौंदर्यीकरण कार्य शुरू कर दिया गया है। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए इस बार रथ को पहले से अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाया जा रहा है।

रथ पर लगेंगे आठ सीसीटीवी कैमरे, बदले जाएंगे उपकरण

ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 1966 में तैयार किए गए करीब 18 फीट ऊंचे सागौन की लकड़ी के रथ की साफ-सफाई, रंग-रोगन और तकनीकी मरम्मत की जा रही है। रथ पर लगा हनुमत ध्वज इस बार नया लगाया जाएगा।

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इसके अलावा पुरानी विद्युत व्यवस्था को हटाकर नई लाइटें और वायरिंग लगाई जा रही है। बारिश से बचाव के लिए रथ की छतरी को भी दुरुस्त किया जा रहा है।

सुरक्षा के लिहाज से रथ पर पहले से लगे चार सीसीटीवी कैमरों के अलावा चार नए कैमरे लगाए जाएंगे। इसके बाद रथ पर कुल आठ सीसीटीवी कैमरे हो जाएंगे, जिनसे मेले के दौरान चारों दिशाओं की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।

1802 में शुरू हुई थी काशी की रथयात्रा परंपरा

शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि काशी में रथयात्रा की परंपरा वर्ष 1802 से चली आ रही है। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर पुराने रथ की जगह बड़ा और मजबूत रथ तैयार किया गया।

वर्तमान रथ का निर्माण वर्ष 1966 में सागौन की लकड़ी से किया गया था। परंपरा के अनुसार पुराने रथ की कुछ लकड़ियों को नए रथ में शामिल किया जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान के रथ की दिव्यता और ऊर्जा बनी रहती है।

हर वर्ष रथ की मरम्मत और संरक्षण किया जाता है। मेला समाप्त होने के बाद रथ को नई रथशाला में सुरक्षित रखा जाएगा।

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15 जुलाई को मेला स्थल पहुंचेगा रथ

रथयात्रा चौराहे स्थित मेला स्थल पर 15 जुलाई की सुबह करीब पांच बजे रथ पहुंचाया जाएगा। उसी दिन शाम को अस्सी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर से प्रभु की डोली यात्रा मेला स्थल पहुंचेगी। शाम छह बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रथ पूजन किया जाएगा।

16 जुलाई की भोर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विधि-विधान से रथ पर विराजमान कराया जाएगा। इसके बाद विशेष श्रृंगार के बाद सूर्योदय से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन-पूजन शुरू होगा। तीन दिवसीय रथयात्रा मेला 18 जुलाई तक चलेगा।

रथयात्रा के साथ शुरू होगी दुर्गा पूजा की तैयारी

काशी की रथयात्रा का पहला दिन केवल भगवान जगन्नाथ की यात्रा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसी दिन दुर्गा पूजा की तैयारियों का भी शुभारंभ होता है।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के अवसर पर कठाम पूजा (खूंटा पूजा) आयोजित की जाएगी, जिसे दुर्गा पूजा की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।

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पांच प्रकार की मिट्टी से तैयार होंगी मां दुर्गा की प्रतिमाएं

मूर्तिकार गंगा तट, नदी संगम, तुलसी के पौधे की जड़ और अन्य पवित्र स्थानों से लाई गई पांच प्रकार की मिट्टी और करीब 10 प्रकार की पूजन सामग्री से विधि-विधान के साथ पूजा करेंगे।

मान्यता है कि इसी दिन मिट्टी में दिव्यता का संचार होता है और मूर्तिकार मां दुर्गा से प्रतिमा निर्माण के लिए क्षमा याचना करते हैं। कठाम पूजा के बाद प्रतिमा निर्माण का कार्य तेज हो जाता है और शहरभर में दुर्गा पूजा पंडालों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

काशी की यह परंपरा पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा संस्कृति से जुड़ी हुई है और वर्षों से धार्मिक आस्था व सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

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