गाजीपुर
कर्बला की याद में निकाले गए अलम, बहादुरी और वफादारी के प्रतीक
आठवीं मोहर्रम पर बहरियाबाद और आसपास के क्षेत्रों में अकीदतमंदों ने किया श्रद्धापूर्वक आयोजन
हजरत अब्बास अलमदार की कुर्बानी और कर्बला के संदेश को किया गया याद
बहरियाबाद (गाजीपुर)। बहरियाबाद तथा आसपास के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में आठवीं मोहर्रम के अवसर पर अलम के जुलूस निकाले गए। इस दौरान अकीदतमंदों ने कर्बला के शहीदों को याद करते हुए मातम किया और हजरत इमाम हुसैन तथा हजरत अब्बास अलमदार की कुर्बानियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया। मोहर्रम में निकाला जाने वाला अलम इस्लामिक इतिहास, विशेषकर कर्बला की घटना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक प्रतीक माना जाता है।
कर्बला की जंग से जुड़ा है अलम का इतिहास
धार्मिक जानकारों के अनुसार 61 हिजरी (680 ईस्वी) में हुई कर्बला की जंग में इमाम हुसैन की सेना का मुख्य ध्वज हजरत अब्बास इब्न अली के हाथों में था। उन्हें आज भी “अब्बास अलमदार” और “गाजी अब्बास” के नाम से याद किया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने आखिरी सांस तक अलम को झुकने नहीं दिया। इसी कारण अलम वफादारी, बहादुरी और सत्य के लिए हर कुर्बानी देने का प्रतीक माना जाता है।

पंजतन पाक की याद दिलाता है अलम का पंजा
मोहर्रम में निकाले जाने वाले अलम विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। इनमें काले, हरे अथवा लाल रंग के कपड़ों का उपयोग किया जाता है। अलम के ऊपरी हिस्से में धातु से बना पंजा लगाया जाता है, जिसे पंजतन पाक का प्रतीक माना जाता है। यह पैगंबर हजरत मोहम्मद, हजरत अली, बीबी फातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन की याद दिलाता है। अलम पर “या हुसैन” और “या अब्बास” जैसे पवित्र शब्द भी अंकित रहते हैं।
अकीदतमंदों ने किया श्रद्धा और सम्मान का प्रदर्शन
मोहर्रम की शुरुआत से ही इमामबाड़ों और अजाखानों में अलम स्थापित कर दिए जाते हैं। आठवीं मोहर्रम को हजरत अब्बास अलमदार की याद में विशेष रूप से अलम का जुलूस निकाला जाता है।

जुलूस के दौरान अकीदतमंद अलम के पीछे-पीछे चलते हैं, नौहा पढ़ते हैं, मातम करते हैं और “या हुसैन” तथा “या अब्बास” की सदाएं बुलंद करते हैं।
कर्बला के शहीदों की कुर्बानी को किया गया याद
धार्मिक विद्वानों के अनुसार आठवीं मोहर्रम का दिन कर्बला में प्यास और सब्र की परीक्षा का प्रतीक माना जाता है। यह दिन याद दिलाता है कि इमाम हुसैन और उनके परिवार ने इस्लाम तथा इंसानियत के मूल्यों की रक्षा के लिए अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन अन्याय के सामने झुके नहीं। इस अवसर पर आयोजित मजलिसों में हजरत अली अकबर की शहादत और हजरत अब्बास द्वारा पानी लाने के प्रयासों को याद कर अकीदतमंदों ने अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
