गोरखपुर
अपशिष्ट ऊष्मा से बिजली उत्पादन की तकनीक पर एमएमएमयूटी के शोधकर्ता को पेटेंट
वेस्ट हीट ड्रिवन थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर सिस्टम विकसित, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में बड़ी उपलब्धि
उद्योगों, वाहनों और विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली व्यर्थ गर्मी को बिजली में बदलेगी नई तकनीक
गोरखपुर। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी), गोरखपुर ने अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रेम शंकर यादव को उनके विकसित किए गए वेस्ट हीट ड्रिवन थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर सिस्टम पर पेटेंट प्राप्त हुआ है। इस तकनीक का विकास उन्होंने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र गौतम तथा जेएसएस एकेडमी ऑफ टेक्निकल एजुकेशन, नोएडा की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संगीता सिंह के सहयोग से किया है।

ऊर्जा बर्बादी और थर्मल प्रदूषण की समस्या का समाधान
शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह तकनीक ऊर्जा क्षेत्र की एक बड़ी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करती है। वर्तमान समय में उद्योगों, वाहनों, विद्युत संयंत्रों तथा घरेलू उपकरणों से बड़ी मात्रा में ऊर्जा ऊष्मा के रूप में व्यर्थ हो जाती है। यह न केवल ऊर्जा की बर्बादी का कारण बनती है, बल्कि पर्यावरणीय ताप वृद्धि और थर्मल प्रदूषण को भी बढ़ावा देती है। नई तकनीक इस अपशिष्ट ऊष्मा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने में सक्षम है।
बिना किसी यांत्रिक भाग के करेगी बिजली उत्पादन
यह प्रणाली सीबेक इफेक्ट के सिद्धांत पर कार्य करती है। इसके अनुसार, थर्मोइलेक्ट्रिक पदार्थों की सतहों पर तापमान में अंतर होने पर विद्युत वोल्टेज उत्पन्न होता है। विकसित प्रणाली इंजन तथा अन्य उच्च तापमान स्रोतों से निकलने वाली अपशिष्ट ऊष्मा को संग्रहित कर उसे उपयोगी बिजली में परिवर्तित करती है। चूंकि इसमें कोई चलने वाले यांत्रिक भाग नहीं हैं, इसलिए यह तकनीक अत्यंत विश्वसनीय, कॉम्पैक्ट और लगभग रखरखाव-मुक्त है।
सेंसर, बैटरी चार्जिंग और सहायक प्रणालियों में होगा उपयोग
पेटेंट प्राप्त इस डिजाइन में उन्नत थर्मोइलेक्ट्रिक मैटेरियल्स, अनुकूलित हीट एक्सचेंजर्स तथा प्रभावी थर्मल मैनेजमेंट तकनीकों का उपयोग किया गया है। इससे ऊर्जा रूपांतरण की दक्षता में वृद्धि होगी। इस तकनीक से उत्पन्न बिजली का उपयोग सेंसरों, सहायक प्रणालियों तथा बैटरी चार्जिंग जैसे कार्यों में किया जा सकेगा।
कार्बन उत्सर्जन घटाने में निभाएगी महत्वपूर्ण भूमिका
विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे थर्मल प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी तथा स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। उद्योगों और परिवहन क्षेत्र में इसके उपयोग से ऊर्जा लागत घटाने में मदद मिलेगी। साथ ही यह तकनीक दूरस्थ एवं ऑफ-ग्रिड क्षेत्रों में विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति का प्रभावी विकल्प बन सकती है। यह नवाचार भारत के नेट ज़ीरो एमिशन्स 2070 लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है।
कुलपति ने दी बधाई
इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि यह पेटेंट विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा दक्षता और पर्यावरणीय स्थिरता जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए विकसित यह तकनीक समाज और राष्ट्र के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। उन्होंने इसे अनुसंधान, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण बताया।
