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गाजीपुर

मांगलिक कार्यों में ओखली और मूसल की परंपरा पर प्रकाश

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सनातन संस्कृति में प्रतीकात्मक महत्व और उपयोगिता

परंपरा को बचाने की आवश्यकता पर जोर

बहरियाबाद, गाजीपुर (जयदेश)। भारतीय सनातन परंपरा में मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, मुंडन और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में ओखली और मूसल का विशेष एवं पवित्र स्थान माना गया है। ग्रामीण परिवेश से लेकर आधुनिक शादियों तक इनका प्रयोग परंपरा और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है।

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार ओखली और मूसल को एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। ओखली को धरती या स्त्री शक्ति का प्रतीक और मूसल को ऊर्जा या पुरुष शक्ति का प्रतीक माना जाता है। विवाह संस्कारों में इनके संयुक्त प्रयोग को यह संदेश देने वाला माना जाता है कि जीवन में सुख-दुख और हर परिस्थिति का सामना मिलकर किया जाना चाहिए।

लोक मान्यताओं के अनुसार मूसल में सुरक्षात्मक ऊर्जा का भी भाव निहित होता है, जिसके कारण विवाह जैसे शुभ अवसरों पर बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए ओखली और मूसल की पूजा की जाती है।

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ओखली और मूसल केवल कृषि या रसोई के साधन नहीं रहे हैं, बल्कि यह धैर्य, संस्कृति और सामूहिक जीवन के प्रतीक भी रहे हैं। इनका इतिहास मानव सभ्यता के विकास से जुड़ा हुआ है, जब खेती की शुरुआत के साथ अनाज को प्रसंस्कृत करने के लिए इनका उपयोग किया जाता था।

प्राचीन समय में ओखली में कूटे गए अनाज और मसालों के प्राकृतिक पोषक तत्व और स्वाद सुरक्षित रहते थे, जबकि आधुनिक मशीनों के उपयोग से कई बार स्वाद और सुगंध प्रभावित हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सामूहिक रूप से ओखली में धान कूटते समय लोकगीत और कजरी गाकर कार्य को सहज और सामाजिक रूप देती थीं, जिससे आपसी संबंध भी मजबूत होते थे।

मूसल का उपयोग एक प्रकार के शारीरिक व्यायाम के रूप में भी लाभकारी माना जाता है, जिससे शरीर की विभिन्न मांसपेशियों का व्यायाम होता है।

इस समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए सुझाव दिया गया है कि कम से कम खड़े मसालों जैसे इलायची, काली मिर्च और अदरक आदि को कूटने के लिए छोटी ओखली का प्रयोग जारी रखा जाए। साथ ही विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों में पारंपरिक ओखली-मूसल की परंपरा को यथासंभव बनाए रखने पर बल दिया गया है।

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