वाराणसी
तिब्बतन मेडिसिन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू
राष्ट्रीय सेमिनार में 140 प्रतिभागियों की सहभागिता, सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति पर होगी चर्चा
सारनाथ, वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन और केंद्रीय तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन, धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में तिब्बतन चिकित्सा पद्धति पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ 11 सितंबर को संस्थान के अतिश सभागार में हुआ। सेमिनार 12 सितंबर तक चलेगा।
सोवा-रिग्पा उपचार का विज्ञान : डॉ. पेमाछो
मुख्य अतिथि केंद्रीय तिब्बतन प्रशासन, धर्मशाला के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. कॉलदेन पेमाछो ने कहा कि सोवा-रिग्पा का अर्थ ‘उपचार का विज्ञान’ है। यह केवल दवा नहीं, बल्कि शरीर, मन और प्रकृति को साथ लेकर चलने वाली चिकित्सा प्रणाली है। उन्होंने बताया कि तिब्बती चिकित्सा तीन दोषों—वायु, पित्त और कफ—पर आधारित है, जो आयुर्वेद से काफी मिलते-जुलते हैं।
हिमालयी जड़ी-बूटियों के उपयोग पर जोर
उन्होंने कहा कि इस चिकित्सा पद्धति में हिमालय में मिलने वाली एक हजार से अधिक जड़ी-बूटियों, खनिजों और भस्मों का उपयोग किया जाता है। इनमें केसर, अगरू, गुग्गुल और शिलाजीत समेत कई दुर्लभ हिमालयी पौधे शामिल हैं। तिब्बती चिकित्सा में बीमारी की जड़ पर काम करने के साथ ध्यान, योग, खानपान और व्यवहार में सुधार पर भी जोर दिया जाता है।
सिद्धांत और नैदानिक अभ्यास पर होंगे प्रस्तुतिकरण
सेंट्रल काउंसिल ऑफ तिब्बतन मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. थुपतेन कुनफेल ने कहा कि सोवा-रिग्पा के चिकित्सकों और छात्रों के लिए चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया है। इसमें देशभर के विद्वानों को सिद्धांत और नैदानिक अभ्यास से जुड़े विषयों पर प्रस्तुतिकरण के लिए आमंत्रित किया गया है।
ग्युशी ग्रंथ का बताया महत्व
मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. पद्मा गुरुमित (राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान, लेह) ने कहा कि तिब्बती चिकित्सा का प्रामाणिक ग्रंथ ‘ग्युशी’ (रग्युद बझी) या चार तंत्र है। इसमें शरीर, रोग, निदान, आहार, आचार-व्यवहार और उपचार की समन्वित समझ प्रस्तुत की गई है।
140 प्रतिभागी ले रहे हिस्सा
अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि तिब्बती चिकित्सा पद्धति प्राचीन परंपरा के साथ आधुनिक समय में भी उपयोगी चिकित्सा प्रणाली है। राष्ट्रीय सेमिनार में 140 सदस्य प्रतिभागिता कर रहे हैं, जबकि देशभर से चयनित 11 सदस्य सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे।
मंत्रोच्चारण से हुआ शुभारंभ
सेमिनार का उद्घाटन तिब्बती आध्यात्मिक परंपरा और मंत्रोच्चारण के साथ हुआ। स्वागत सोवा-रिग्पा विभाग के संकाय प्रमुख प्रो. दोर्जे दमदुल ने तथा धन्यवाद विभागाध्यक्ष डॉ. टाशी दावा ने किया।
