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गाजीपुर

गाजीपुर मेडिकल कॉलेज: सिस्टम का ‘इलाज’ कौन करेगा?स्टाफ की कमी और बाहर की दवाओं के खेल से जनता बेहाल

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गाजीपुर (जयदेश)। करोड़ों का बजट और ‘मेडिकल कॉलेज’ की बड़ी तख्ती भी गाजीपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने में नाकाम साबित हो रही है। सोमवार को अस्पताल परिसर से आई तस्वीरें शासन और प्रशासन के दावों की धज्जियां उड़ा रही हैं। यहाँ दवा के एक-एक पुर्जे के लिए मरीज घंटों कतारों में सिसकने को मजबूर हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

बाहर की दवाओं का काला खेल
जयदेश न्यूज़ के राजेश कुमार रावत की ग्राउंड रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा हुआ है। घंटों लाइन में लगने के बाद जब मरीज काउंटर पर पहुंचता है, तो उसे पूरी दवाएं नहीं दी जातीं। डॉक्टर द्वारा लिखे गए पर्चे में से मात्र 1 या 2 सस्ती दवाएं देकर बाकी के लिए ‘बाहर से ले लो’ कहकर मरीज को चलता कर दिया जाता है। आखिर मेडिकल कॉलेज में दवाओं का यह अकाल क्यों है? क्या यह गरीब जनता की जेब पर डाका डालने की कोई बड़ी साजिश है?

प्रशासनिक विफलता : डीएम और प्रधानाचार्य की चुप्पी

अस्पताल में स्टाफ की भारी कमी के कारण आधे से ज्यादा दवा वितरण काउंटर बंद पड़े हैं। प्रधानाचार्य और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस खेल ने डीएम गाजीपुर की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या प्रशासन किसी बड़े जन-आक्रोश का इंतजार कर रहा है? स्टाफ की तैनाती और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है?

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स्वास्थ्य मंत्री जी, क्या यही है आपका उत्तम स्वास्थ्य मॉडल? जयदेश न्यूज़ सीधे स्वास्थ्य मंत्री से सवाल करता है कि क्या गाजीपुर की जनता सिर्फ लाइनों में लगने के लिए है? एक तरफ सरकार बेहतर इलाज के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर मेडिकल कॉलेज में मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है।

मुख्य बिंदु जो जवाब मांगते हैं-

पर्चे की पूरी दवाएं अस्पताल के अंदर क्यों नहीं मिल रही हैं? 

भीड़ के बावजूद अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती क्यों नहीं की गई?

घंटों लाइन में खड़ा रहने के बाद भी इलाज के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति क्यों?

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क्या दोषी अधिकारियों और डॉक्टरों पर गाज गिरेगी?

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