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गाजीपुर

कर्बला में पानी पर पहरा: यज़ीदी फौज की क्रूरता और इमाम हुसैन की अडिग कुर्बानी

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फरात नदी से पानी रोककर बच्चों और महिलाओं तक को प्यासा रखा गया

सब्र, इंसाफ और सत्य की राह पर डटे रहे इमाम हुसैन, कर्बला बनी मानवता की मिसाल

बहरियाबाद (गाजीपुर)। इस्लामी इतिहास में कर्बला की घटना अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है। 2 मुहर्रम 61 हिजरी को हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) अपने परिवार और वफादार साथियों के साथ इराक के कर्बला मैदान में पहुंचे, जहां यज़ीद के गवर्नर इब्ने ज़ियाद के आदेश पर यज़ीदी फौज ने उनके काफिले को चारों ओर से घेर लिया।

कर्बला के तपते रेगिस्तानी मैदान के निकट बहने वाली फरात नदी ही पानी का एकमात्र स्रोत थी। 7 मुहर्रम को इब्ने ज़ियाद के आदेश पर यज़ीदी सेनापति उमर बिन साद ने अम्र बिन हज्जाज के नेतृत्व में सैकड़ों सैनिकों को नदी पर तैनात कर दिया, ताकि इमाम हुसैन और उनके साथियों तक पानी की एक बूंद भी न पहुंच सके।

पानी बंद होने के बाद इमाम हुसैन के खेमे में भीषण संकट उत्पन्न हो गया। छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं और साथी कई दिनों तक प्यास की कठिन परीक्षा से गुजरते रहे। इसी दौरान हज़रत अब्बास (अ.स.) ने बहादुरी का परिचय देते हुए अपने साथियों के साथ नदी तक पहुंचकर कुछ पानी खेमे में पहुंचाया, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था।

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प्यास की तीव्रता का अंदाजा इसी से लगाया जाता है कि इमाम हुसैन के छह माह के पुत्र हज़रत अली असगर की हालत अत्यंत गंभीर हो गई। परंपरागत वर्णनों के अनुसार इमाम हुसैन उन्हें लेकर यज़ीदी सेना के सामने पहुंचे और मासूम बच्चे के लिए पानी की गुहार लगाई, लेकिन इसके बजाय उन पर तीर चलाया गया, जिससे अली असगर शहीद हो गए।

आशूरा के दिन हज़रत अब्बास (अ.स.) एक बार फिर बच्चों के लिए पानी लाने फरात नदी की ओर बढ़े। उन्होंने बहादुरी से दुश्मन की पंक्तियों को पार कर मश्क में पानी भरा, लेकिन वापसी के दौरान उन पर चारों ओर से हमला किया गया। उनके दोनों हाथ काट दिए गए और अंततः वे शहीद हो गए। पानी से भरी मश्क भी तीर लगने से फट गई और बच्चों तक पानी नहीं पहुंच सका।

इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों के अनुसार पानी पर पहरा लगाने का उद्देश्य इमाम हुसैन को यज़ीद की बैअत स्वीकार करने के लिए मजबूर करना था। लेकिन इमाम हुसैन ने अपने सिद्धांतों, न्याय और सत्य के मार्ग से समझौता नहीं किया। उन्होंने तमाम कठिनाइयों और कुर्बानियों के बावजूद अत्याचार के आगे सिर नहीं झुकाया।

कर्बला की यह घटना आज भी मानवता, धैर्य, त्याग और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। मुहर्रम के दिनों में दुनिया भर के अकीदतमंद कर्बला के शहीदों को याद कर उनके आदर्शों को अपनाने का संदेश देते हैं।

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