गाजीपुर
प्रधान हो पक्षकार और नेता हो रिश्तेदार, तो मानिए आप ही हैं सरकार!
चौपालों में गूंजता व्यंग्य, निष्पक्षता और पारदर्शिता पर उठने लगे सवाल
लोकतंत्र में विश्वास की बुनियाद है निष्पक्षता, पक्षपात की चर्चा से बढ़ती है जनता की नाराजगी
गाजीपुर। ग्रामीण राजनीति में इन दिनों एक व्यंग्यात्मक पंक्ति खूब चर्चा का विषय बनी हुई है— *”प्रधान हो पक्षकार और नेता हो रिश्तेदार, तो मानिए आप ही हैं सरकार।” यह महज एक तंज नहीं, बल्कि उन चर्चाओं का प्रतिबिंब है जो गांवों की चौपालों, चाय की दुकानों और सामाजिक बैठकों में अक्सर सुनाई देती हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद समानता, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर टिकी होती है। पंचायतों को गांव के विकास और जनसमस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है, लेकिन जब किसी क्षेत्र में कुछ लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ता हुआ दिखाई देता है और निर्णयों को लेकर सवाल उठने लगते हैं, तब जनचर्चाओं का दौर भी तेज हो जाता है।
जब आम लोगों को करना पड़े इंतजार
ग्रामीण अंचलों में अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है कि कुछ लोगों की बातें आसानी से सुनी जाती हैं और उनके कार्य प्राथमिकता के आधार पर पूरे होते दिखाई देते हैं, जबकि आम लोगों को अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। भले ही इन चर्चाओं के पीछे कोई प्रत्यक्ष आरोप न हो, लेकिन जनमानस में उठने वाले सवाल व्यवस्था के प्रति लोगों की सोच को अवश्य दर्शाते हैं।
ग्रामीण समाज के जानकारों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों को केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका आचरण भी ऐसा होना चाहिए जिससे निष्पक्षता स्पष्ट रूप से दिखाई दे। लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है और एक बार उस विश्वास में दरार आ जाए तो उसे दोबारा मजबूत करना आसान नहीं होता।
योजनाओं और सुविधाओं को लेकर उठते हैं सवाल
चौपालों में लोग यह भी कहते सुने जाते हैं कि जब योजनाओं की जानकारी, सरकारी सुविधाओं का लाभ और निर्णय प्रक्रिया कुछ खास लोगों तक सीमित दिखाई देने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि हर व्यक्ति को समान अवसर मिले और किसी को यह महसूस न हो कि उसकी आवाज कम महत्वपूर्ण है।
इसी संदर्भ में ग्रामीणों के बीच एक और व्यंग्यात्मक टिप्पणी प्रचलित है—
“जब हर रास्ता एक ही दरवाजे पर जाकर रुके, हर फैसला एक ही तरफ झुके और हर आवाज का वजन रिश्तों से तय होने लगे, तब लोकतंत्र कम और दरबार ज्यादा दिखाई देने लगता है।”
जनता की अपेक्षा है पारदर्शिता और जवाबदेही
यद्यपि यह बातें व्यंग्य के रूप में कही जाती हैं, लेकिन इनके पीछे व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता की अपेक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ग्रामीणों का मानना है कि पंचायत और स्थानीय नेतृत्व को ऐसे सभी अवसरों से बचना चाहिए, जिनसे पक्षपात या प्रभाव के आरोपों को बल मिले।
ग्रामीण राजनीति का इतिहास भी यही बताता है कि जनता सब कुछ देखती और समझती है। जब पक्षपात की चर्चाएं बढ़ने लगती हैं, जब आम आदमी को अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़े और जब व्यवस्था कुछ लोगों तक सिमटती हुई दिखाई दे, तब सबसे अधिक निराशा स्वयं जनता को होती है।
लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है
लोग अक्सर यह सोचकर स्वयं को कोसते हैं कि आखिर उन्होंने किस उम्मीद से अपना प्रतिनिधि चुना था। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि जनता को केवल पछताने का नहीं, बल्कि सुधार का भी अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि जब विश्वास डगमगाने लगता है, तब चौपालों की नाराजगी धीरे-धीरे जनमत में बदलती है और जनमत ही आगे चलकर सत्ता परिवर्तन का आधार बन जाता है।
आखिर लोकतंत्र में अंतिम मुहर किसी पद, प्रभाव, रिश्तेदारी या रसूख की नहीं, बल्कि जनता की होती है। जनता जब तक साथ है, सत्ता है और जब जनता मुंह मोड़ लेती है, तब सबसे मजबूत कुर्सियां भी डगमगा जाती हैं।
