गाजीपुर
भोजपुरी लोकगायन की समृद्ध परंपरा पर उठे सवाल, स्वघोषित उपाधियों पर कलाकारों की चिंता
पहले साहित्य और लोकसंस्कृति का माध्यम था बिरहा, अब उपाधियों की होड़ में खो रही पहचान
बहरियाबाद (गाजीपुर)। भोजपुरी माटी की सांस्कृतिक विरासत में कजरी और बिरहा गायन का विशेष स्थान रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित इन लोकविधाओं ने वर्षों तक गीता, पुराण, बाइबिल, गुरु ग्रंथ साहिब और कुरआन जैसी पवित्र पुस्तकों की कथाओं को सरल भोजपुरी भाषा में जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। साथ ही देशभक्ति और सामाजिक चेतना के संदेश भी लोकगीतों के माध्यम से प्रसारित किए जाते रहे हैं।
बिरहा की समृद्ध परंपरा गुरु बिहारी जी से प्रारंभ होकर गुरु पट्टू, गुरु गणेश, गुरु रम्मन, गुरु रामलगन दादा, राजा रामपाल, दादा राम, आधार दादा, राम कैलाश तथा मरहूम हैदर अली जुगनू जैसे दिग्गज कलाकारों तक पहुंची। इन कलाकारों ने अपने गायन और साहित्यिक योगदान से बिरहा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
योगदान से मिलती थी पहचान, आज उपाधियों की बढ़ी होड़
लोकगायन से जुड़े जानकारों का मानना है कि बिरहा के क्षेत्र में “सम्राट” जैसी उपाधियां कलाकारों को उनके असाधारण योगदान और लोकप्रियता के आधार पर मिलीं। बिरहा सम्राट विजय लाल यादव और हैदर अली जुगनू जैसे कलाकारों को यह सम्मान उनकी कला साधना और जनस्वीकृति के कारण प्राप्त हुआ। बताया जाता है कि उन्हें यह पहचान संगीत जगत में उनके उल्लेखनीय योगदान के चलते मिली थी।
लेकिन वर्तमान समय में कई कलाकार स्वयं को “बिरहा सम्राट” घोषित कर रहे हैं, जिससे इस सम्मानजनक उपाधि की गरिमा पर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसी उपाधियां प्रदान करने का अधिकार किसके पास है और इनके लिए कोई मानक भी है या नहीं?
साहित्यिक संवाद की जगह बढ़ा मंचीय प्रदर्शन
वरिष्ठ लोकसंस्कृति प्रेमियों का कहना है कि पहले बिरहा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साहित्य, इतिहास, धर्म और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम था। मंचों पर कलाकारों के बीच प्रश्नोत्तर, तर्क-वितर्क और पौराणिक प्रसंगों की प्रस्तुति होती थी। श्रोता ज्ञान और मनोरंजन दोनों प्राप्त करते थे।
वर्तमान दौर में बिरहा मंचों पर नृत्य और आकर्षक प्रस्तुतियों का प्रभाव बढ़ा है। आलोचकों का मानना है कि इससे बिरहा की मूल साहित्यिक और सांस्कृतिक आत्मा प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि किसी भी कलाकार को पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि उसने बिरहा और भोजपुरी संस्कृति के लिए क्या योगदान दिया है, उसके बाद ही किसी बड़ी उपाधि का उपयोग करना चाहिए।
लोकविधा की गरिमा बचाने की जरूरत
बिरहा केवल एक गायन शैली नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक पहचान है। इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए आवश्यक है कि कलाकार उपाधियों की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर कला, साहित्य और संस्कृति के विकास पर ध्यान दें। तभी बिरहा की वह गरिमा और प्रतिष्ठा बनी रह सकेगी, जिसने इसे लोकमानस में विशिष्ट स्थान दिलाया है।
