गाजीपुर
मोहर्रम की तीसरी तारीख: कर्बला में संघर्ष का निर्णायक अध्याय शुरू
इमाम हुसैन ने अत्याचार के सामने झुकने से किया इंकार, हक और नैतिकता का दिया संदेश
कर्बला की भूमि खरीदकर इंसाफ और कानून के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रस्तुत किया अद्भुत उदाहरण
बहरियाबाद (गाजीपुर)। मोहर्रम की तीसरी तारीख इस्लामी इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन मानी जाती है। इसी दिन कर्बला की सरजमीं पर इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके परिवार के खिलाफ यज़ीदी शासन की ओर से दबाव और घेराबंदी का दौर तेज हो गया था।
इतिहास के अनुसार, मोहर्रम की दूसरी तारीख को इमाम हुसैन (अ.स.) का काफिला कर्बला पहुंच चुका था। तीसरी मोहर्रम को कूफा के गवर्नर उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद का एक पत्र इमाम हुसैन के पास पहुंचा, जिसमें यज़ीद की बैअत स्वीकार करने अथवा परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। इमाम हुसैन ने इस पत्र को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि सत्य और न्याय के मार्ग से समझौता संभव नहीं है।
इसके बाद इब्ने ज़ियाद ने उमर इब्ने साद को चार हजार सैनिकों के साथ कर्बला भेजा। कर्बला पहुंचने पर उमर इब्ने साद ने इमाम हुसैन से उनके आने का कारण पूछा। जवाब में इमाम ने कहा कि उन्हें कूफा के लोगों ने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने और इस्लाम की रक्षा के लिए बुलाया था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अब लोग उन्हें नहीं चाहते तो वह वापस लौटने को तैयार हैं।
बताया जाता है कि उमर इब्ने साद इस समाधान से संतुष्ट था और उसने शांति का प्रस्ताव कूफा भेजा, लेकिन यज़ीदी शासन के प्रभाव में यह प्रयास सफल नहीं हो सका। इसके बाद कर्बला में तनाव और बढ़ गया।
मोहर्रम की तीसरी तारीख का एक महत्वपूर्ण प्रसंग यह भी है कि इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला की उस भूमि को, जहां बाद में उनकी शहादत हुई, स्थानीय कबीले के लोगों से खरीद लिया था। भूमि खरीदने के बाद उन्होंने उसे पुनः उन्हीं लोगों को दान करते हुए यह जिम्मेदारी सौंपी कि उनकी शहादत के बाद उन्हें और उनके साथियों को सम्मानपूर्वक दफनाया जाए तथा आने वाले ज़ायरीन की सेवा की जाए।
यह घटना इस बात का प्रतीक है कि कठिनतम परिस्थितियों में भी इमाम हुसैन (अ.स.) ने कानून, इंसाफ, नैतिकता और मानवता के सिद्धांतों का साथ नहीं छोड़ा। वहीं दूसरी ओर यज़ीदी सेना का घेरा लगातार सख्त होता जा रहा था, जिससे कर्बला की महान कुर्बानी की भूमिका तैयार हो रही थी।
