गाजीपुर
ग्राम प्रधान चुनाव और ‘मुर्गा-दारू’ की राजनीति, लोकतंत्र पर पड़ रहा असर
चुनावी मौसम में बढ़ी दावतों की चर्चा, विकास के मुद्दे पड़ रहे पीछे
मतदाता जागरूकता और निष्पक्ष मतदान की जरूरत पर जोर
बहरियाबाद (गाजीपुर)। पंचायत चुनाव की आहट के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में चुनावी चर्चाएं तेज हो गई हैं। संभावित प्रत्याशी जहां जनसंपर्क में जुटे हैं, वहीं कुछ क्षेत्रों में चुनाव के दौरान ‘मुर्गा और दारू’ की परंपरा को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। ग्रामीण राजनीति में यह एक ऐसी हकीकत मानी जाती है, जो चुनावी माहौल को प्रभावित करती रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव अब केवल विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गए हैं। कई बार प्रत्याशियों के बीच मतदाताओं को लुभाने के लिए खान-पान और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की होड़ देखने को मिलती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है और वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
चुनावी खर्च बढ़ने से पैदा होती हैं नई चुनौतियां
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ मतदाता चुनाव के समय उम्मीदवारों से विशेष अपेक्षाएं रखते हैं। ऐसे में कई प्रत्याशी चुनावी प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भारी खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। चुनाव के दौरान बढ़ता खर्च बाद में विकास कार्यों और जनहित की योजनाओं पर भी असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब चुनाव का केंद्र विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बजाय व्यक्तिगत लाभ बन जाता है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ने लगती है।
प्रशासन की निगरानी के बावजूद जारी रहती हैं कोशिशें
चुनाव के दौरान प्रशासन और निर्वाचन आयोग की ओर से शराब, नकदी और अन्य प्रलोभनों के वितरण पर रोक लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं। इसके बावजूद कई बार नियमों को दरकिनार कर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिशें सामने आती हैं।
प्रशासन का कहना है कि चुनाव को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए लगातार निगरानी रखी जाती है तथा आचार संहिता के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जाती है।
जागरूक मतदाता ही बदल सकते हैं तस्वीर
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि चुनावी सुधार की शुरुआत मतदाता जागरूकता से होगी। यदि मतदाता अल्पकालिक लाभ के बजाय गांव के दीर्घकालिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देंगे, तो चुनाव की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।
ग्राम प्रधान चुनाव को लेकर क्षेत्र में चर्चाओं का दौर जारी है, लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि मतदान विकास और जनहित के मुद्दों पर आधारित हो, न कि किसी प्रकार के प्रलोभन पर।
