गाजीपुर
सातवीं मोहर्रम पर निकला सद्दा का जुलूस, “या हुसैन” की सदाओं से गूंजा मुहम्मदाबाद क्षेत्र
कर्बला पहुंचकर अकीदतमंदों ने अदा की रस्में, शर्बत की सबीलों से हुआ स्वागत
मुहम्मदाबाद (गाजीपुर)। मोहर्रम की सातवीं तारीख पर मंगलवार को मुहम्मदाबाद नगर, यूसुफपुर तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में गम और अकीदत का माहौल देखने को मिला। विभिन्न मोहल्लों और गांवों से पारंपरिक सद्दा का जुलूस निकाला गया, जो निर्धारित मार्गों से होता हुआ कर्बला पहुंचा। जुलूस के दौरान पूरा क्षेत्र “या हुसैन” और “या अली” की सदाओं से गूंजता रहा।
नौहाखानी और मर्सिया से गमगीन हुआ माहौल
जुलूस में शामिल अकीदतमंद हाथों में अलम और झंडे लिए आगे बढ़ रहे थे। जुलूस के अग्रभाग में ढोल, ताशे और नगाड़े बज रहे थे, जबकि पीछे चल रहे लोग हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए नौहाखानी और मर्सिया पढ़ रहे थे। इस दौरान कई अकीदतमंदों की आंखें नम दिखाई दीं और पूरा वातावरण गमगीन बना रहा।
बच्चों की मुसलमानी और बद्धी पहनाने की निभाई गई परंपरा
सातवीं मोहर्रम के अवसर पर मुस्लिम समाज में कई पारंपरिक और धार्मिक रस्में भी निभाई गईं। इस दिन अनेक परिवारों ने अपने बच्चों की मुसलमानी (खतना) कराई, जिसे धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
इसी क्रम में बच्चों को ‘बद्धी’ भी पहनाई गई। यह एक विशेष धागा होता है, जिसे दोनों कंधों से निकालकर सीने से लगाते हुए धारण कराया जाता है। इसे लोग अपनी मन्नत, अकीदत और धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं।
रेउड़ी और पट्टी का बांटा गया नियाज
मोहर्रम की सातवीं तारीख पर रेउड़ी और पट्टी का नियाज भी बांटा गया। रेउड़ी तिल और चीनी से बनी पारंपरिक मिठाई होती है, जबकि पट्टी गुड़ या चीनी से तैयार की जाती है। लोगों ने इन्हें अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और अकीदतमंदों में वितरित किया।
जगह-जगह लगीं शर्बत की सबीलें
जुलूस मार्ग पर नगर और ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक स्थानों पर शर्बत और पानी की सबीलें लगाई गईं। राहगीरों तथा जुलूस में शामिल लोगों को शर्बत पिलाकर उनका स्वागत किया गया। कई स्थानों पर लोगों ने अलम और झंडों का सम्मान करते हुए दुआएं भी मांगीं।
कर्बला की मिट्टी को माना जाता है बरकत वाला
कर्बला पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं ने वहां की मिट्टी प्राप्त कर अपने साथ घर ले गए। मान्यता है कि कर्बला की मिट्टी पाक, पवित्र और बरकत वाली होती है, जिसे लोग अपने घरों में सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखते हैं।
इंसानियत और भाईचारे का संदेश देती है परंपरा
मोहर्रम की सातवीं तारीख पर निकाला जाने वाला सद्दा जुलूस केवल धार्मिक परंपरा भर नहीं है, बल्कि हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी, सब्र, इंसानियत और सच्चाई के संदेश को याद करने का अवसर भी है। अकीदत, सेवा भाव और आपसी भाईचारे से ओतप्रोत यह परंपरा आज भी समाज को प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश देती है।
