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गाजीपुर

मोहर्रम का पहला दिन: नए इस्लामी साल की शुरुआत और कर्बला की याद

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बहरियाबाद क्षेत्र में मोहर्रम की तैयारियां पूरी, गमगीन माहौल में चांद का इस्तकबाल

बहरियाबाद (गाजीपुर)। बहरियाबाद तथा आसपास के मुस्लिम बहुल गांवों में मोहर्रम मनाने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मोहर्रम का चांद दिखाई देते ही मुस्लिम समाज में गम और अकीदत का माहौल व्याप्त हो गया। मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर (हिजरी संवत) का पहला महीना माना जाता है और इसकी पहली तारीख नए इस्लामी वर्ष की शुरुआत का प्रतीक होती है।

हिजरत की याद से जुड़ा है मोहर्रम का पहला दिन

इस्लामी मान्यताओं के अनुसार मोहर्रम की पहली तारीख पैगंबर हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मक्का से मदीना की ऐतिहासिक हिजरत की याद दिलाती है। इसी महत्वपूर्ण घटना को आधार बनाकर हजरत उमर फारूक (रजि.) के दौर-ए-खिलाफत में हिजरी कैलेंडर की शुरुआत की गई थी।

इस अवसर पर मुस्लिम समाज नए साल के आगाज पर दुआएं मांगता है, बीते वर्ष की गलतियों के लिए अल्लाह से माफी मांगता है तथा आने वाले वर्ष में अमन, भाईचारे और खुशहाली की कामना करता है।

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कर्बला के गम की भी होती है शुरुआत

मोहर्रम का महीना हजरत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके परिवार तथा साथियों की शहादत की याद में भी मनाया जाता है। मोहर्रम की पहली तारीख से ही कर्बला के दर्दनाक घटनाक्रम की स्मृतियां ताजा होने लगती हैं।

इतिहास के अनुसार, यजीद की बैअत स्वीकार करने से इंकार करने के बाद इमाम हुसैन ने मदीना छोड़ दिया था। मोहर्रम की पहली तारीख के आसपास यजीद की सेना के कमांडर हुर इब्ने यजीद रियाही ने इमाम हुसैन के काफिले को रोक लिया था और उन्हें कर्बला की ओर बढ़ने के लिए विवश किया गया।

हक और इंसाफ के लिए कुर्बानी का प्रतीक

मोहर्रम का पहला दिन एक ओर नए इस्लामी वर्ष की शुरुआत का दिन है, वहीं दूसरी ओर यह कर्बला के दस दिनों के उस गम की शुरुआत भी है, जो 10 मोहर्रम (यौमे आशूरा) को हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की महान शहादत पर समाप्त होता है।

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कर्बला की घटना आज भी पूरी दुनिया के लिए सत्य, न्याय, साहस और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है। मोहर्रम का महीना इंसानियत, सब्र, कुर्बानी और हक की राह पर डटे रहने का संदेश देता है।

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