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गाजीपुर

तहसील प्रभारी राजेश कुमार रावत की कलम से

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शहर के लकड़ी के टाल इमामबाड़े से उठी कदीमी ‘मोतिया की ताजिया’

चौक पर उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब

गाजीपुर — मुहर्रम की गमगीन रौनक

गाजीपुर में नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन और उनके जांनिसार साथियों की याद में मुहर्रम का त्योहार पूरे अकीदत और गमगीन माहौल में मनाया जा रहा है। मुहर्रम के दूसरे दिन शहर की कदीमी रिवायत को कायम रखते हुए ‘मोतिया की ताजिया’ का जुलूस पूरी शान-ओ-शौकत के साथ बरामद हुआ।

यह ऐतिहासिक परंपरा मुगल काल से चली आ रही है, जो आज भी कौमी एकता और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बनी हुई है।

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इमामबाड़े से बरामदगी और तयशुदा गुजरगाह

शहर के लकड़ी के टाल स्थित मुख्य इमामबाड़े से मजलिस और मातम के बीच जुलूस का आगाज हुआ।
मोतिया के सफेद फूलों और मखमली चादरों से सजी भव्य ताजिया को देखने के लिए रास्तों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

जुलूस मीर अशरफ अली मार्ग से होकर आगे बढ़ा, जहां अंजुमनों ने ‘या हुसैन’ की सदाओं के बीच पुरदर्द नौहाख्वानी और सीनाज़नी का प्रदर्शन किया।

चौक पर ऐतिहासिक दृश्य और अकीदत का समंदर

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जुलूस जैसे ही शहर के मुख्य चौक पर पहुंचा, वहां अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ पड़ा।

जुलूस के साथ चल रहे हजरत इमाम हुसैन के वफादार घोड़े ‘जुलजनाह’ के प्रतीक को भी पूरे एहतराम के साथ सजाया गया था। इस दौरान अखाड़े के जांबाजों ने हैरतअंगेज करतब दिखाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

लकड़ी के टाल से लेकर चौक तक हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की झलक साफ देखने को मिली। लोगों ने मिलकर जुलूस का इस्तकबाल किया और जगह-जगह सबील लगाकर सेवा भावना का परिचय दिया।

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अकीदत के साथ हुआ समापन

आखिर में पूरे माहौल में गम और श्रद्धा के बीच नम आंखों से बारगाह-ए-हुसैन में खिराज-ए-अकीदत पेश की गई।

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