गोरखपुर
चाय की केतली के साथ तीन बहनों के सपने भी उबलते हैं
विश्वविद्यालय गेट पर चाय की दुकान बनी संघर्ष का सहारा
गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के गेट के सामने सुबह चाय की केतली चढ़ती है तो उसके साथ तीन बहनों के सपने भी उबलने लगते हैं। महराजगंज की रहने वाली वर्तिका, वंदिता और अवंतिका के लिए ‘विलिवर विस्ट्रो’ महज चाय का स्टॉल नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच अपने पैरों पर खड़े होने और सपनों को जिंदा रखने का जरिया है।
पिता को लकवा पड़ा तो बदली परिवार की जिंदगी
वर्ष 2017 में पिता राम सकल उपाध्याय को लकवा पड़ने के बाद परिवार की परिस्थितियां बदल गईं। इलाज और दवाइयों का खर्च बढ़ा तो घर की जिम्मेदारियां भी बढ़ती चली गईं। तीनों बहनों ने इन परिस्थितियों को अपनी पढ़ाई के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। करीब तीन महीने पहले तीनों ने महज आठ हजार रुपये जुटाकर विश्वविद्यालय गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू किया। बाद में मैगी को भी मेन्यू में शामिल कर लिया।
किसी का लक्ष्य प्रशासनिक अधिकारी बनना
22 वर्षीय वर्तिका बीएससी कर चुकी हैं और सिविल सेवा में जाकर प्रशासनिक अधिकारी बनने का लक्ष्य लेकर तैयारी कर रही हैं। 21 वर्षीय वंदिता आईपीएस बनने की तैयारी कर रही हैं, जबकि 19 वर्षीय अवंतिका की आंखों में भी आईएएस बनने का सपना है।
सुबह दुकान, रात में किताबों के साथ पढ़ाई
दुकान सुबह सात बजे खुलती है और शाम सात बजे तक चलती है। दिनभर ग्राहकों को चाय और मैगी देने के बाद दुकान बंद होती है तो तीनों की पढ़ाई की दूसरी पारी शुरू होती है। वे सुबह भी कुछ समय पढ़ाई के लिए निकालती हैं और रात 10 बजे से दो बजे तक किताबों और नोट्स के साथ तैयारी करती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में एआई और यूट्यूब भी उनका सहारा हैं। किसी सवाल पर अटकने पर इन माध्यमों से जानकारी हासिल करती हैं।
तीनों बहनें मिलकर संभालती हैं दुकान
वर्तिका और वंदिता बताती हैं कि तीनों साथ रहती हैं, इसलिए दुकान संभालने में एक-दूसरे का सहयोग मिलता है। दुकान से होने वाली कमाई पिता की दवाइयों और घर की जरूरतों में मदद करती है। इससे पढ़ाई भी जारी है और किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती।
संघर्ष को बना लिया जिंदगी का हिस्सा
संघर्ष के सवाल पर बहनों का कहना है कि वे बचपन से ही परिस्थितियों से जूझती रही हैं। इसलिए अब थकान पहले जैसी महसूस नहीं होती। उनका कहना है कि उम्मीद है कि एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी।
चाय की दुकान से बड़े सपनों तक का सफर
विश्वविद्यालय गेट से गुजरने वाले लोग कुछ मिनट रुककर चाय पीते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन इसी छोटी-सी दुकान पर तीन बहनें अपने जीवन की बड़ी कहानी लिख रही हैं। दिन में उनके हाथ चाय की केतली थामते हैं और रात में वही हाथ किताबों के पन्ने पलटते हैं। उनके लिए यह दुकान मंजिल नहीं, बल्कि उस रास्ते का पहला पड़ाव है जहां वे अपने बड़े सपनों को साकार करने की तैयारी कर रही हैं।
