गाजीपुर
किश्त की गाड़ी में बैठा इंसान, पैदल चलने वाले से ज्यादा गरीब होता है
दिखावे की संस्कृति ने बदली जीवन की प्राथमिकताएं
गाजीपुर| आधुनिकता की चकाचौंध और दिखावे की संस्कृति ने लोगों की जीवन प्राथमिकताओं को काफी बदल दिया है। अपनी हैसियत से अधिक दिखने की चाहत में बड़ी संख्या में लोग कर्ज और ईएमआई के जाल में फंसते जा रहे हैं। चमकती गाड़ी, महंगा मोबाइल और आलीशान जीवनशैली बाहर से भले ही समृद्धि का संकेत लगें, लेकिन इनके पीछे छिपा आर्थिक दबाव कई बार गंभीर होता है।
हर कर्ज बुरा नहीं, उद्देश्य महत्वपूर्ण
कर्ज अपने आप में बुरा नहीं है। असली सवाल यह है कि कर्ज किस उद्देश्य से लिया जा रहा है। व्यवसाय बढ़ाने, स्वरोजगार शुरू करने, शिक्षा या ऐसी संपत्ति के लिए लिया गया ऋण, जिससे भविष्य में आय का स्रोत तैयार हो, निवेश की तरह देखा जा सकता है। यह उस बीज की तरह है, जो समय के साथ फल देने की क्षमता रखता है।
दिखावे के लिए लिया कर्ज बन जाता है बोझ
इसके विपरीत केवल दिखावे और उपभोग के लिए लिया गया कर्ज आर्थिक बोझ बन सकता है। महंगी गाड़ी, नया मोबाइल या ऐसी वस्तुएं, जिनसे आय में कोई वृद्धि नहीं होती, यदि सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने के लिए कर्ज लेकर खरीदी जाएं तो उनकी मासिक किश्त धीरे-धीरे आय का बड़ा हिस्सा निगल सकती है।
कर्जमुक्त व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता अधिक
यही वजह है कि एक कड़वा सामाजिक सच सामने आता है—किश्त की गाड़ी में बैठा व्यक्ति कई बार पैदल चल रहे उस व्यक्ति से ज्यादा गरीब होता है, जिसके ऊपर कोई कर्ज नहीं है। पैदल चलने वाला व्यक्ति भले ही साधनहीन दिखाई दे, लेकिन यदि उसकी आमदनी पर भारी ईएमआई का बोझ नहीं है तो उसकी आर्थिक स्वतंत्रता कहीं अधिक हो सकती है।
एक कर्ज से दूसरे कर्ज का दुष्चक्र
समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब व्यक्ति अपनी वास्तविक आय और खर्च का आकलन किए बिना लगातार कर्ज लेता चला जाता है। एक किश्त चुकाने के लिए दूसरा ऋण और दूसरे ऋण की अदायगी के लिए तीसरा रास्ता तलाशना आर्थिक विवेक नहीं, बल्कि दुष्चक्र है।
युवाओं को आर्थिक समझदारी की जरूरत
भांवरकोल और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को विशेष रूप से इस अंतर को समझने की जरूरत है। आधुनिक सुविधाएं जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा साबित करने के लिए नहीं। आर्थिक सफलता का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि हमारे पास कितनी महंगी चीजें हैं, बल्कि यह है कि हमारी आय में से कितना हिस्सा वास्तव में हमारे नियंत्रण में है।
कर्ज लेने से पहले खुद से पूछें सवाल
कोई भी ऋण लेने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए—“यह कर्ज मेरी आय बढ़ाएगा या हर महीने मेरी आय का बड़ा हिस्सा मुझसे छीनता रहेगा?” यदि जवाब आय बढ़ाने की दिशा में है तो निर्णय सोच-समझकर लिया जा सकता है। लेकिन यदि कर्ज केवल दिखावे की जरूरत पूरी करने के लिए है तो रुककर विचार करना बेहतर है।
समृद्धि का पैमाना सुकून और बचत
आर्थिक समृद्धि का पैमाना केवल चमकती गाड़ी नहीं, बल्कि कर्जमुक्त नींद, नियंत्रित खर्च और भविष्य के लिए बचत है। दिखावे की दौड़ में आगे निकलने से बेहतर है कि व्यक्ति अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर रहकर सुकून की जिंदगी जिए।
