गाजीपुर
विलुप्त होती जा रही लकड़ी की पटरी, मिट्टी का चाक, स्लेट, कलम और दवात
आधुनिक शिक्षा के दौर में खो रही पारंपरिक लेखन संस्कृति, बच्चों की लेखन क्षमता पर पड़ रहा प्रभाव
प्रारंभिक शिक्षा का स्तर गिरने से अभिभावकों में बढ़ी चिंता
बहरियाबाद (गाजीपुर)। समय के साथ शिक्षा के साधनों और तरीकों में व्यापक परिवर्तन आया है। डिजिटल युग में जहां मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर शिक्षा के प्रमुख माध्यम बनते जा रहे हैं, वहीं कभी प्राथमिक शिक्षा की पहचान रहे लकड़ी की पटरी, मिट्टी का चाक, स्लेट, सरकंडे की कलम और दवात-स्याही अब धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों का मानना है कि इन पारंपरिक साधनों के खत्म होने से बच्चों की लेखन क्षमता और प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

एक समय था जब विद्यालयों में छोटे-छोटे बच्चे लकड़ी की पटरी पर लिखना सीखते थे। सरकंडे या बांस की कलम और स्याही की दवात के माध्यम से उन्हें अक्षरों का अभ्यास कराया जाता था। यह केवल लेखन का माध्यम नहीं था, बल्कि बच्चों में धैर्य, एकाग्रता और सुंदर लिखावट विकसित करने का प्रभावी तरीका भी था।
लेखन कौशल के विकास में थी महत्वपूर्ण भूमिका
शिक्षकों के अनुसार पटरी और स्लेट पर लिखने से बच्चों की उंगलियों और हाथों की मांसपेशियों का बेहतर विकास होता था। सरकंडे की कलम पकड़कर लिखने में विशेष नियंत्रण और संतुलन की आवश्यकता होती थी, जिससे बच्चों की लेखन शैली में स्वाभाविक सुधार आता था।
विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्तमान समय में मोबाइल और टैबलेट के अत्यधिक उपयोग के कारण बच्चों की ‘फाइन मोटर स्किल्स’ अपेक्षाकृत कमजोर हो रही हैं। कई बच्चों को सही तरीके से पेंसिल पकड़ने और लंबे समय तक लिखने में भी कठिनाई होती है।
धैर्य और एकाग्रता का था अभ्यास
पुरानी शिक्षा पद्धति में पटरी पर लिखने से पहले उसे तैयार करना, स्याही बनाना और सावधानीपूर्वक अक्षर लिखना पड़ता था। गलती होने पर पूरी पटरी को साफ कर दोबारा लिखना होता था। इस प्रक्रिया से बच्चों में धैर्य, अनुशासन और एकाग्रता का विकास होता था।
वहीं आज डिजिटल माध्यमों में ‘डिलीट’ और ‘बैकस्पेस’ जैसे विकल्पों ने गलतियों को तुरंत सुधारना आसान बना दिया है। इससे बच्चों में लिखने के प्रति गंभीरता और सावधानी का भाव कम होता जा रहा है।
सुंदर लिखावट की परंपरा हो रही समाप्त
सुलेख कला के लिए पटरी, स्लेट और दवात-स्याही सबसे प्रभावी साधन माने जाते थे। कलम की नोक को विशेष आकार देकर अक्षरों को सुंदर रूप दिया जाता था, जिससे लिखावट आकर्षक और स्पष्ट बनती थी। आज कीबोर्ड और टच स्क्रीन आधारित लेखन ने हस्तलेखन की उस विशिष्ट पहचान को काफी हद तक कम कर दिया है।
परंपरा और आधुनिकता में संतुलन की जरूरत
शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि तकनीकी विकास का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ पारंपरिक लेखन अभ्यास को भी पूरी तरह समाप्त नहीं होने देना चाहिए। प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों को स्लेट, चाक और हस्तलेखन का पर्याप्त अभ्यास कराया जाना आवश्यक है, ताकि उनकी लेखन क्षमता, रचनात्मकता और मानसिक विकास संतुलित रूप से हो सके।
बदलते समय में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक शिक्षा पद्धति के बीच संतुलन बनाना ही बच्चों के बेहतर भविष्य और मजबूत बुनियादी शिक्षा की कुंजी साबित हो सकता है।
