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गोरखपुर

15 साल बाद सरकार को मिली चार एकड़ बेशकीमती जमीन

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भू-माफिया और राजस्व कर्मियों की मिलीभगत उजागर

एसडीएम कोर्ट ने 2008 का फैसला बहाल किया, फर्जी दस्तावेजों से हुए नामांतरण निरस्त

गोरखपुर। बांसगांव तहसील के कौड़ीराम क्षेत्र में भू-माफियाओं और भ्रष्ट राजस्व कर्मियों की कथित मिलीभगत से सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में बड़ा फैसला सामने आया है। करीब चार एकड़ नजूल (सरकारी) भूमि को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर निजी नामों में दर्ज कराने के मामले में एसडीएम बांसगांव की अदालत ने 15 वर्ष पुराने विवाद का निस्तारण करते हुए जमीन को दोबारा सरकारी खाते (सरकार बहादुर कैसर-ए-हिंद) में दर्ज करने का आदेश दिया है।

करोड़ों की सरकारी जमीन पर था कब्जे का खेल

मामला बांसगांव तहसील के रानीपुर गांव स्थित नजूल की करीब चार एकड़ बेशकीमती जमीन से जुड़ा है। इस भूमि पर वर्तमान में कई दुकानें और एक अस्पताल भी बने हुए हैं। वर्ष 2007 में प्रशासनिक सर्वे के दौरान आराजी संख्या 22क, 22ख, 41 और 110 की भूमि को सरकारी संपत्ति पाया गया था।

आरोप है कि तत्कालीन राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से फर्जी अभिलेख तैयार कर इस भूमि को कुछ व्यक्तियों के नाम दर्ज कराया गया, जिन्होंने बाद में इसे 21 अन्य लोगों को बेच दिया।

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फैसलों में आया उतार-चढ़ाव

वर्ष 2008 में तत्कालीन एसडीएम प्रदीप कुमार सिंह ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर भूमि को सरकारी घोषित करते हुए आदेश पारित किया था। हालांकि, 2011 में एक अन्य एसडीएम ने उस आदेश को पलटते हुए कब्जाधारकों के पक्ष में निर्णय दे दिया।

इस आदेश के विरुद्ध 2021 में शासकीय अधिवक्ता द्वारा अपील दायर की गई। लंबी सुनवाई के बाद 27 अप्रैल 2026 को एसडीएम बांसगांव की अदालत ने अंतिम फैसला सुनाते हुए वर्ष 2011 के आदेश को निरस्त कर दिया और वर्ष 2008 का मूल आदेश बहाल कर दिया।

अवैध नाम हटेंगे, दोषियों पर होगी कार्रवाई

अदालत ने आदेश दिया है कि सभी अवैध खरीदारों के नाम राजस्व अभिलेखों से हटाकर भूमि को पुनः सरकार के नाम दर्ज किया जाए। साथ ही, फर्जीवाड़े में शामिल पाए जाने वाले संबंधित राजस्व कर्मियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

क्या है ‘सरकार बहादुर कैसर-ए-हिंद’ भूमि?

सरकार बहादुर कैसर-ए-हिंद‘ उन सरकारी भूमि अभिलेखों को कहा जाता है, जो ब्रिटिश शासनकाल में सरकार के अधीन थीं। स्वतंत्रता और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद इन भूमि का स्वामित्व केंद्र या संबंधित राज्य सरकार के पास आ गया। ऐसी भूमि पूरी तरह सरकारी संपत्ति होती है और इसे किसी निजी व्यक्ति या संस्था द्वारा खरीदा या बेचा नहीं जा सकता।

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