भदोही
पितृपक्ष शुरू, तर्पण और श्राद्ध कर्म की परंपरा का महत्व
पितृपक्ष के प्रारंभ के साथ ही तर्पण किया जाना चाहिए, तीन दिन बाद से तर्पण करने की धारणा गलत
ज्ञानपुर। पितरों को श्रद्धापूर्वक श्राद्ध अर्पित करने की परंपरा अश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक मानी जाती है। पितृपक्ष के प्रारंभ के साथ ही तर्पण और अन्य श्राद्ध कर्म किए जाने चाहिए। लोगों में यह धारणा है कि पितृपक्ष शुरू होने के तीन दिन बाद से तर्पण करना चाहिए, जबकि यह सही नहीं है। पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के माध्यम से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा है।
राजीव कुमार पाठक ने बताया कि महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार श्राद्ध का उपदेश सबसे पहले अत्रि मुनि ने दिया था। इसके बाद महर्षि निमि ने सबसे पहले श्राद्ध किया। धीरे-धीरे अन्य महर्षियों ने भी श्राद्ध कर्म शुरू किया और पितरों को अन्न का भोग अर्पित करने की परंपरा आगे बढ़ी।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों में श्राद्ध कर्म में अग्नि की विशेष महत्ता बताई गई है। हवन के बाद निमित्त पिंडदान करने की परंपरा है। इसमें पहले पिता, फिर दादा और उसके बाद परदादा को तर्पण किया जाता है। अमावस्या की तिथि पर श्राद्ध करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
पितृपक्ष के श्राद्ध में तिल और कुश को महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुश के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में शिव का निवास माना गया है। वहीं ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि और तुलसी को कभी बासी न होने वाला बताया गया है।
धर्मशास्त्रों में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण तीन प्रकार के ऋण बताए गए हैं। मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वजों के निमित्त श्रद्धा से किए गए तर्पण और अर्पण से पितर तृप्त होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस अवधि को महालय भी कहा जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार उचित समय, स्थान और विधि से पितरों के नाम पर अर्पित की गई वस्तु को श्राद्ध कहा जाता है। पिंडदान श्राद्ध कर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इसलिए अपने दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है।
