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गाजीपुर

नागपंचमी पर कुश्ती-दंगल का होता था आयोजन

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कुंडेसर समेत कई गांवों में लगता था पहलवानों का जमावड़ा, दंगल देखने उमड़ती थी हजारों की भीड़

कनुवान की पचइयां की तैयारियां पूरे साल चलती थीं, नागपंचमी पर खेत में सजता था अखाड़ा

कुंडेसर/गाजीपुर। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर ग्रामीण क्षेत्रों में नागपंचमी का पर्व परंपरागत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। घरों में नाग देवता को दूध और लावा चढ़ाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। ग्रामीण जीवन में नागपंचमी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि आपसी मेल-जोल, खेल और सामूहिक उत्सव का भी अवसर हुआ करती थी। इसी से जुड़ी कुश्ती-दंगल की परंपरा अब धीरे-धीरे अतीत की याद बनती जा रही है।

अखाड़े की पूजा के बाद शुरू होता था दंगल

क्षेत्र के कुंडेसर, परसदा, धनेठा, बाठा, जगदीशपुर, सुरनी, अमरूपुर, बसनिया और सियाड़ी सहित कई गांवों में नागपंचमी के अवसर पर अखाड़े की पूजा के बाद कुश्ती प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं। आसपास के गांवों से पहलवान पहुंचते और अपने दांव-पेंच का प्रदर्शन करते थे। दंगल देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण भी जुटते थे।

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पूरे साल होती थी पहलवानों की तैयारी

कनुवान गांव की पचइयां यानी नागपंचमी कभी ग्रामीण अंचल का प्रमुख आयोजन हुआ करती थी। इसकी तैयारियां पूरे साल चलती थीं। परिवार अपने युवा सदस्य को पहलवानी के लिए तैयार करते थे। उसके खान-पान, व्यायाम और अभ्यास पर विशेष ध्यान दिया जाता था। गांव के कुछ पहलवानों को विशेष प्रतिष्ठा हासिल होती थी और पूरे क्षेत्र की निगाह उनके मुकाबलों पर रहती थी।

जुते खेत में सजता था अखाड़ा

नागपंचमी के दिन जुते हुए खेत में दंगल का आयोजन होता था। पहलवानों के साथ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। ग्रामीण बाजार में दुकानें सज जाती थीं और कड़ी धूप के बावजूद लोग घंटों बैठकर मुकाबले देखते थे। अखाड़े में पहलवानों के दांव-पेंच के साथ दर्शकों के उत्साह से माहौल रोमांचक बना रहता था।

दंगल में बुजुर्गों की भूमिका भी अहम

कई बार मुकाबले का तनाव पहलवानों से ज्यादा उनके समर्थकों में दिखाई देता था। अपने पहलवान को हारता देख समर्थकों के बीच गर्मागर्मी बढ़ जाती थी। ऐसे समय में गांव के बुजुर्ग स्थिति संभालते थे। ग्रामीणों के अनुसार कपिल देव राय अपनी सूझ-बूझ और प्रभाव से विवादों को शांत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। नागपंचमी के दंगल की चर्चा होते ही ग्रामीणों को आज भी उनकी याद आती है।

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गांव की एकजुटता का प्रतीक था दंगल

उस दौर में दंगल महज कुश्ती प्रतियोगिता नहीं, बल्कि गांव की प्रतिष्ठा, एकजुटता और खेल भावना का उत्सव हुआ करता था। पहलवानों के साथ दर्शकों में भी अपने गांव और अपने पहलवान को लेकर जबरदस्त उत्साह रहता था। बुजुर्गों की समझदारी से जोश के साथ अनुशासन भी कायम रहता था।

आज भी कई स्थानों पर कुश्ती-दंगल की परंपरा किसी न किसी रूप में जारी है, लेकिन पहले जैसी तैयारी, भीड़ और उत्साह कम दिखाई देता है। बदलते समय के साथ अखाड़ा संस्कृति भी सिमट रही है। इसके बावजूद बुजुर्ग ग्रामीणों की स्मृतियों में वह दौर आज भी जीवंत है, जब नागपंचमी का मतलब पूजा, अखाड़ा, दंगल और गांव की सामूहिक उमंग हुआ करता था।

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