बलिया
श्रावण के प्रथम सोमवार पर विशेष: क्यों होती है शिवलिंग की पूजा?
वैदिक ग्रंथों और पुराणों में वर्णित है शिवलिंग का आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व
बलिया। श्रावण मास के प्रथम सोमवार पर देशभर के शिवालयों में भगवान भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इस अवसर पर पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक ने शिवलिंग पूजन के धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि शिवलिंग भारतीय संस्कृति में सृष्टि, ऊर्जा और अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। शिव पूजा की परंपरा के प्रमाण ऋग्वेद, यजुर्वेद, उपनिषद, शिव पुराण, मत्स्य पुराण तथा सिंधु सभ्यता के अवशेषों में भी मिलते हैं।
शिवलिंग क्यों है विशेष?
डॉ. गणेश पाठक के अनुसार, शिव पुराण और स्कंद पुराण में शिवलिंग को ओंकार (प्रणव) का स्थूल एवं सूक्ष्म स्वरूप बताया गया है। ‘लिंग’ का अर्थ केवल प्रतीक या चिह्न नहीं, बल्कि वह स्वरूप भी है जिसमें संपूर्ण सृष्टि का लय और पुनः सृजन होता है। धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु और ऊपरी भाग में भगवान शिव का निवास होता है। इसलिए शिवलिंग की पूजा को त्रिदेवों की संयुक्त आराधना माना जाता है।
ब्रह्मा और विष्णु के विवाद से जुड़ी है कथा
स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उसी समय उनके मध्य एक अनंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवता उसके आदि और अंत का पता लगाने में असफल रहे। तब भगवान शिव प्रकट हुए और स्वयं को सृष्टि का मूल कारण बताया। इसी घटना के बाद से शिवलिंग पूजन की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज तक श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है।
श्रावण में शिव आराधना का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रावण मास में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित कर भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। यही कारण है कि श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिवालयों में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है और भक्त पूरे विधि-विधान से भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं।
