गाजीपुर
महिला केवल बहू-बेटी, पत्नी और मां ही नहीं होती, बल्कि वह एक स्वतंत्र इंसान है : कीर्ति श्रीवास्तव
नंदगंज (गाजीपुर) जयदेश। भारत में प्राचीन समय में नारी की स्थिति एक जैसी नहीं रही, बल्कि समय के अनुसार इसमें बदलाव आता रहा। वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, धर्म और समाज में भाग लेने की स्वतंत्रता थी। वे वेदों का अध्ययन करती थीं और गार्गी वाचक्नवी तथा मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाएँ अपने ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थीं। इस काल में पर्दा या घूंघट प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। जिससे यह समझा जाता है कि उस समय महिलाओं पर इस प्रकार की पाबंदियाँ नहीं थीं।
बाद के मध्यकाल में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के कारण महिलाओं की स्वतंत्रता कम होने लगी। सुरक्षा, परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर पर्दा और घूंघट जैसी प्रथाएँ प्रचलित हो गईं। जो धीरे-धीरे महिलाओं के लिए एक बंधन बन गईं।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि इज्जत केवल घूंघट करने या घर में रहने से नहीं होती, बल्कि वह व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार में होती है। सच्चा सम्मान तब मिलता है जब समाज में स्त्री और पुरुष दोनों को समान दृष्टि से देखा जाए और उनके गुणों व कर्मों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए। इस प्रकार, हमें पुरानी परंपराओं को समझते हुए एक ऐसे समाज की ओर बढ़ना चाहिए जहाँ नारी को सम्मान और स्वतंत्रता दोनों प्राप्त हों।
महिला केवल बहू, बेटी, पत्नी या माँ ही नहीं होती, बल्कि वह एक स्वतंत्र इंसान है, जिसे अपनी सोच, अपने फैसले और अपनी जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है। समाज को चाहिए कि वह उसे किसी रिश्ते की सीमाओं में बाँधकर न देखें, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में उसकी पहचान और स्वतंत्रता का सम्मान करे।
