बलिया
पर्यावरण के सबसे बड़े संरक्षक हैं भगवान शिव : डॉ. गणेश कुमार पाठक
कैलाश पर निवास से विषपान तक, महादेव का हर स्वरूप प्रकृति संरक्षण का देता है संदेश
पंचतत्वों की रक्षा और गंगा को जटाओं में धारण करना जल संरक्षण की प्रेरणा
बलिया। देवाधिदेव भगवान शिव को केवल देवों के देव ही नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जैव विविधता के सच्चे संरक्षक के रूप में भी देखा जाता है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. गणेश कुमार पाठक के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध शक्ति एवं प्रकृति के अनूठे संतुलन का प्रतीक है। प्रकृति और शक्ति के बिना शिव का स्वरूप अधूरा है। यही कारण है कि महादेव का संबंध समूची प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पंचतत्वों के संरक्षण का संदेश
डॉ. पाठक ने कहा कि भगवान शिव का स्वरूप प्रकृति के पंचतत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर से जुड़ा है। कैलाश पर्वत पर उनका निवास भी प्रकृति और पारिस्थितिकी के संरक्षण का प्रतीक माना जा सकता है। शिव का स्वरूप मानव को प्रकृति के साथ संतुलित और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
विषैले जीवों और पौधों को अपनाने की सीख
उन्होंने बताया कि जिन जीवों और पौधों को मनुष्य कभी विनाशकारी या विषैला मानता था, भगवान शिव ने उन्हें अपने साथ स्थान देकर सह-अस्तित्व का संदेश दिया। सांप और बिच्छू जैसे जीवों के साथ धतूरा, आक और भांग जैसे पौधों का शिव से जुड़ाव प्रकृति के प्रत्येक घटक के महत्व को दर्शाता है।
विषपान से गंगा धारण तक संरक्षण का संदेश
समुद्र मंथन से निकले विष को स्वयं धारण कर भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा का संदेश दिया। वहीं गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उन्होंने जल संरक्षण और जल के संतुलित प्रवाह का प्रतीक प्रस्तुत किया। शिवलिंग पर बूंद-बूंद जल अर्पित करने की परंपरा को भी जल के महत्व और संरक्षण से जोड़कर देखा जा सकता है।
डॉ. पाठक के अनुसार महादेव का स्वरूप मानव के साथ-साथ पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, जैविक और अजैविक घटकों के संरक्षण तथा प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की प्रेरणा देता है।
