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वाराणसी

जिसने शिक्षा का दीप जलाया, उसकी स्मृति-स्थली उपेक्षा के अंधेरे में

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राजर्षि उदय प्रताप सिंह की प्रतिमा तक पहुंचना मुश्किल, प्राचीन छात्र संगठन ने मुख्यमंत्री से मांगा ‘राजर्षि स्मृति उद्यान’

वाराणसी। काशी में शिक्षा की अलख जगाने वाले राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव की कमच्छा स्थित स्मृति-स्थली इन दिनों उपेक्षा के अंधेरे में है। सेंट्रल हिंदू स्कूल के निकट भिनगा अनाथालय परिसर में स्थापित राजर्षि की प्रतिमा तक पहुंचने के लिए न तो समुचित मार्ग है और न ही परिसर का अपेक्षित रखरखाव। विशाल भू-भाग झाड़ियों और जंगल से घिरा है। कई स्थानों पर जलभराव होने से प्रतिमा तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया है।

राजर्षि की जयंती पर शुक्रवार को प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुंचे उदय प्रताप कॉलेज के प्राचीन छात्रों ने स्थल की बदहाल स्थिति देखी तो चिंता जताई। प्राचीन छात्र संगठन ने इसे राजर्षि की स्मृति और उनके योगदान के प्रति उपेक्षा बताया। संगठन के अध्यक्ष डॉ. रामसुधार सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर पूरे क्षेत्र को ‘राजर्षि स्मृति उद्यान’ के रूप में विकसित करने की मांग की है।

1909 में रखी थी शिक्षा की मजबूत नींव

संगठन की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव का जन्म तीन सितंबर 1850 को हुआ था। उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्ष 1909 में उनके प्रयासों से उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना हुई, जिसने पूर्वांचल में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे महापुरुष की स्मृति से जुड़े स्थल की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है।

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पक्का मार्ग, सौंदर्यीकरण और जलभराव से मुक्ति की मांग

प्राचीन छात्र संगठन ने स्मृति-स्थल के समग्र विकास की मांग की है। इसमें राजर्षि की प्रतिमा का सौंदर्यीकरण, प्रतिमा तक पक्का मार्ग बनाने, जलभराव की समस्या का स्थायी समाधान, परिसर में हरित क्षेत्र विकसित करने और राजर्षि के जीवन, शिक्षा व समाजसेवा से जुड़े तथ्यों को प्रदर्शित करने के लिए सूचना-पट्ट लगाने का सुझाव दिया गया है। नई पीढ़ी को राजर्षि के योगदान से परिचित कराने के लिए छोटी स्मृति दीर्घा विकसित करने की मांग भी की गई है।

‘प्रतिमा नहीं, काशी की शिक्षा-संस्कार की जीवित स्मृति’

डॉ. रामसुधार सिंह ने मुख्यमंत्री से स्थल का निरीक्षण कराकर इसके विकास की कार्ययोजना तैयार कराने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि राजर्षि की प्रतिमा महज पत्थर की प्रतिमा नहीं, बल्कि काशी की शिक्षा, सेवा और संस्कार की जीवित स्मृति है। जिस महापुरुष ने शिक्षा का दीप जलाकर हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को दिशा दी, उनकी स्मृति-स्थली को उपेक्षित नहीं छोड़ा जाना चाहिए। स्थल को विकसित कर उसे गरिमापूर्ण स्वरूप देना ही राजर्षि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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