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गाजीपुर

रक्षाबंधन: भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का पर्व

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भांवरकोल, गाजीपुर। सावन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। यह पर्व केवल कलाई पर बांधे जाने वाले धागे तक सीमित नहीं है, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में स्नेह, जिम्मेदारी और एक-दूसरे का साथ निभाने की भावना को मजबूत करता है।

रक्षाबंधन का अर्थ ‘रक्षा’ यानी सुरक्षा और ‘बंधन’ यानी प्रेम के धागे से बंधना है। इस दिन बहनें भाई के माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाकर उसकी कलाई पर राखी बांधती हैं। साथ ही भाई की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी बहन को उपहार देकर हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने और उसकी रक्षा का संकल्प लेते हैं।

पौराणिक कथाओं में भी मिलता है राखी का महत्व

रक्षाबंधन से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण की उंगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक हिस्सा बांध दिया था। उनके इस स्नेह से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें बहन माना और उनकी रक्षा का वचन निभाया।

इसी तरह राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा भी रक्षाबंधन से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया और भगवान विष्णु को बैकुंठ वापस ले जाने का वरदान मांगा।

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यमराज और यमुना की कथा भी है प्रचलित

पौराणिक मान्यताओं में यमराज और यमुना की कथा का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि यमुना द्वारा यमराज का तिलक कर रक्षासूत्र बांधने और आतिथ्य सत्कार करने से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया था।

रक्षाबंधन का पर्व आज भी भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है। साथ ही यह समाज में आपसी स्नेह, सुरक्षा और सद्भाव का संदेश भी देता है।

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