वाराणसी
रक्षाबंधन रक्षा-सूत्र में निहित भारतीय संस्कृति की विराट चेतना : कुलपति
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने रक्षाबंधन एवं श्रावणी पर्व की पूर्व संध्या पर कहा कि भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उल्लास के अवसर नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों, सामाजिक चेतना और आध्यात्मिक दृष्टि के पुनर्स्मरण का माध्यम हैं। रक्षाबंधन में स्नेह, विश्वास, संरक्षण, कर्तव्य, मंगलकामना और सामाजिक समरसता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन मुख्यतः भाई-बहन के पवित्र प्रेम का पर्व है, लेकिन इसकी चेतना इससे कहीं व्यापक है। ‘रक्षा’ का अर्थ केवल व्यक्ति की सुरक्षा नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। रक्षा-सूत्र हमें यह संदेश देता है कि रिश्ते केवल अधिकार नहीं, बल्कि परस्पर उत्तरदायित्व और सम्मान का नाम हैं।
कुलपति ने कहा कि भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र की स्मृति प्राचीन काल से रही है। वैदिक परंपरा में श्रावणी पूर्णिमा का संबंध उपाकर्म, स्वाध्याय और ऋषि-स्मरण से रहा है। पुराण एवं महाकाव्य परंपरा में भी रक्षाबंधन से जुड़े विभिन्न आख्यान मिलते हैं, जिनका मूल संदेश संकट के समय संबंधों की गरिमा और संरक्षण के संकल्प को मजबूत करना है।
प्रो. शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन को नारी सम्मान, समानता और गरिमा के व्यापक संकल्प से जोड़ना आवश्यक है। रक्षा का संकल्प तभी सार्थक है, जब प्रत्येक नारी को सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और भयमुक्त वातावरण मिले। साथ ही समाज में भेदभाव से ऊपर उठकर समरसता, सहयोग और मानवीय संवेदना को मजबूत करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन का संदेश परिवार से राष्ट्र तक विस्तृत है। देश की सांस्कृतिक एकता की रक्षा, संविधानसम्मत मूल्यों का सम्मान तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता भी व्यापक रक्षा-भाव का हिस्सा है।
कुलपति ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें जल, वृक्ष, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के जीवनाधिकार की रक्षा का संकल्प भी लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि राखी का मूल्य उसकी कीमत में नहीं, बल्कि उसमें निहित आत्मीयता में है। संबंधों में संवाद, सम्मान, संवेदना और विश्वास का महत्व उपहार से कहीं अधिक है।
उन्होंने संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा की रक्षा को भी सांस्कृतिक उत्तरदायित्व बताते हुए कहा कि संस्कृत भारत की समृद्ध ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण संवाहिका है।
अंत में प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन केवल एक धागे का नहीं, बल्कि विराट मानवीय चेतना का पर्व है। इस अवसर पर मानवता, नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता, प्रकृति, भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने सभी देशवासियों को रक्षाबंधन की हार्दिक मंगलकामनाएं दीं।
