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गाजीपुर

बादलों का इंतजार: समय पर बारिश न होने से किसानों की व्यथा बढ़ी

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बहरियाबाद क्षेत्र में मानसून की देरी से खेती पर संकट

धान की नर्सरी सूखने से किसानों की चिंता गहरी

बहरियाबाद (गाजीपुर)। इस वर्ष मानसून के समय पर सक्रिय न होने और मौसम के बदलते मिजाज के कारण बहरियाबाद एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के किसान गहरी परेशानी का सामना कर रहे हैं। बारिश न होने से खेतों में धान की नर्सरी सूखने लगी है, जिससे कृषि कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान संकट में

ग्राम सभा चक फरीद के समाजसेवी नवीन चौहान ने बताया कि किसानों ने कर्ज लेकर खाद और बीज की व्यवस्था की थी, लेकिन समय पर बारिश न होने से उनकी फसलें प्रभावित हो गईं।

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उन्होंने कहा कि जून के दूसरे सप्ताह तक बारिश की उम्मीद थी, लेकिन अब जुलाई में भी तेज धूप के कारण धान की नर्सरी झुलस रही है। इससे किसानों के सामने कर्ज चुकाने और परिवार के भरण-पोषण की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।

ट्यूबवेल सिंचाई पर बढ़ता दबाव

ग्राम सभा बीरभान, रुकुनपुर दरगाह के किसान राजेश यादव ने बताया कि बारिश न होने के कारण पूरी तरह ट्यूबवेल पर निर्भरता बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि दिन-रात मोटर चलाने से डीजल और बिजली का खर्च बढ़ गया है।

इसके साथ ही भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जिससे बोरवेल के भी जवाब देने का खतरा पैदा हो गया है। किसानों को इस वर्ष लागत दोगुनी और उत्पादन आधा होने की आशंका सता रही है।

जलवायु परिवर्तन पर चिंता

ग्राम सभा आराजी कस्बा स्वाद के बाबूराम यादव ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से मानसून का पैटर्न बिगड़ता जा रहा है। कभी बारिश नहीं होती तो कभी एक साथ अत्यधिक बारिश से बाढ़ की स्थिति बन जाती है।

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उन्होंने कहा कि अब खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव और जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है।

ग्रामीण जीवन पर दोहरी मार

ग्राम सभा भरतपुर के समाजसेवी मदन गाजीपुरी ने कहा कि बारिश न होने से केवल फसलें ही नहीं, बल्कि मवेशियों के लिए चारे और पीने के पानी का भी गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।

उन्होंने बताया कि कुएं सूखने लगे हैं, जिससे ग्रामीणों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ रहा है, जबकि कई पुरुष रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

कृषि संकट से व्यापक असर

किसानों के बयानों से स्पष्ट है कि समय पर बारिश न होना केवल कृषि उत्पादन की समस्या नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पेयजल व्यवस्था, पशुपालन और मानसिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है।

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समाधान की आवश्यकता

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार और कृषि वैज्ञानिकों को मिलकर जल संचयन, सटीक मौसम पूर्वानुमान और सूखा-प्रतिरोधी बीजों के उपयोग को बढ़ावा देना होगा, ताकि किसानों को हर वर्ष मानसून पर निर्भर न रहना पड़े।

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