Connect with us

गाजीपुर

बहरियाबाद में मिट्टी का जुलूस देखने उमड़ा जनसैलाब

Published

on

Loading...
Loading...

मोहर्रम की परंपरा के तहत कर्बला से मिट्टी लाकर इमाम चौकों पर रखी गई

हिंदू-मुस्लिम एकता और अकीदत का दिखा अनूठा संगम

बहरियाबाद (गाजीपुर)। मोहर्रम के अवसर पर बहरियाबाद एवं आसपास के क्षेत्रों में निकाले गए मिट्टी के जुलूस को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। क्षेत्र के विभिन्न मोहल्लों और गांवों से ताजियादारों के नेतृत्व में श्रद्धालुओं ने कर्बला से मिट्टी लाकर अपने-अपने इमाम चौकों पर अकीदत के साथ स्थापित की।

बहरियाबाद के उत्तर मोहल्ला के ताजियादार शमीमुल वरा तथा दक्षिण मोहल्ला के ताजियादार बादशाह, मुंतज़िर इमाम, काजी हेसामुद्दीन और उस्ताद मोहम्मद सलीम नेता के नेतृत्व में सामूहिक जुलूस निकाला गया। देर रात श्रद्धालु कर्बला से मिट्टी लेकर चौक पहुंचे और उसे श्रद्धापूर्वक स्थापित किया।

Advertisement

इसी क्रम में ग्राम सभा बघांव (देईपुर) के ताजियादार हाजी फरीद अंसारी एवं अबरार अंसारी द्वारा भव्य जुलूस निकाला गया। वहीं रुकुनपुर दरगाह एवं मलिकनगांव के ताजियादार महफूज आलम के नेतृत्व में भी श्रद्धालुओं ने कर्बला से मिट्टी लाकर चौक पर रखी।

जुलूस मार्ग पर रही विशेष व्यवस्था

जुलूस को देखने के लिए बड़ी संख्या में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एकत्रित हुए। भीषण गर्मी को देखते हुए खिलाड़ियों एवं श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह शरबत और नींबू पानी की व्यवस्था की गई थी। मुख्य सड़क पर जुलूस पहुंचने के बाद पुलिस प्रशासन ने यातायात को सुचारु बनाए रखने के लिए वैकल्पिक मार्गों की व्यवस्था की। पूरे कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रही।

श्रद्धालु “या हसन, या हुसैन” के नारों के साथ बाजा-गाजा, नौहाखानी और सीनाजनी करते हुए आगे बढ़ रहे थे। कई स्थानों पर जंजीर का मातम भी किया गया, जिससे कर्बला की शहादत की यादें ताजा हो उठीं।

मोहर्रम में मिट्टी की रस्म का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

मोहर्रम के महीने में इमाम चौक या इमामबाड़ों पर मिट्टी लाकर रखने की परंपरा को विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है। इसे कई क्षेत्रों में “मिट्टी धराई” अथवा “मिट्टी का जुलूस” कहा जाता है।

Advertisement

यह रस्म इराक के कर्बला मैदान की याद दिलाती है, जहां पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने सत्य और न्याय की रक्षा करते हुए शहादत प्राप्त की थी। श्रद्धालु स्थानीय कर्बला से मिट्टी लाकर प्रतीकात्मक रूप से उस पवित्र भूमि और शहादत से अपना संबंध जोड़ते हैं।

मोहर्रम के शुरुआती दिनों में अकीदतमंद जुलूस की शक्ल में कर्बला जाते हैं और वहां से मिट्टी लाकर इमाम चौकों पर स्थापित करते हैं। इसके बाद ही मोहर्रम की अन्य रस्में, जैसे चिराग जलाना, फातिहा पढ़ना और मन्नत मांगना शुरू होती हैं।

कई स्थानों पर इसी मिट्टी को ताजिया स्थापना का आधार माना जाता है। श्रद्धालु शाम के समय चौक पर एकत्रित होकर शरबत, मलीदा और शीरनी की फातिहा दिलाते हैं तथा अगरबत्ती और मोमबत्तियां जलाकर रोशनी करते हैं।

भाईचारे और सौहार्द की मिसाल

सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी आपसी भाईचारे, सामाजिक सौहार्द और धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी हुई है। खास बात यह रही कि इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोगों ने भी सहभागिता कर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश की।

Advertisement

Copyright © 2024 Jaidesh News. Created By Hoodaa

You cannot copy content of this page