गोरखपुर
पेट के बाहर आंतों के साथ जन्मे नवजात को एम्स गोरखपुर में मिला नया जीवन
गोरखपुर। ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसस गोरखपुर के चिकित्सकों ने “गैस्ट्रोस्कीसिस” (Gastroschisis) जैसी दुर्लभ एवं जानलेवा जन्मजात बीमारी से पीड़ित एक गंभीर नवजात शिशु का सफल उपचार कर उसे नया जीवन दिया। यह बीमारी ऐसी स्थिति होती है जिसमें बच्चा पेट के बाहर आंतों तथा कभी-कभी अन्य पेट के अंगों के साथ जन्म लेता है।
देवरिया के लार रोड निवासी संजना और अमर के शिशु में गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड में इस बीमारी का पता चल गया था। चिकित्सकों के अनुसार गैस्ट्रोस्कीसिस एक गंभीर जन्मजात विकार है, जिसमें पेट की दीवार में छेद होने के कारण बच्चे की आंतें बाहर रहती हैं। यदि जन्म के तुरंत बाद उपचार न मिले, तो बाहर निकली आंतों में सूजन, संक्रमण, पानी की कमी एवं गंभीर क्षति हो सकती है, जिससे सेप्सिस, सांस लेने में तकलीफ, शरीर में लवण असंतुलन, कई अंगों के फेल होने जैसी जानलेवा समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
शिशु का जन्म गर्भावस्था के 33वें सप्ताह में मात्र 2 किलोग्राम वजन के साथ हुआ, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो गई। जन्म के समय बच्चे की लगभग पूरी छोटी एवं बड़ी आंत, पेट (स्टमक), इलियोसीकल जंक्शन तथा अपेंडिक्स पेट के बाहर थे।
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की डॉ. शिखा सेठ के नेतृत्व में शिशु की डिलीवरी कराई गई। डिलीवरी के तुरंत बाद ही नियोनेटोलॉजी टीम तथा पीडियाट्रिक सर्जरी टीम के डॉ. श्रेयस के. एवं डॉ. आदित्य ने लेबर रूम में तत्काल उपचार शुरू किया। बाहर निकली आंतों को सुरक्षित रखने तथा धीरे-धीरे पेट के अंदर पहुंचाने के लिए “साइलो बैग” लगाया गया और आंतों का आंशिक रिडक्शन किया गया।
हालांकि उस समय NICU में भर्ती सभी नवजात बच्चों को वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता थी, जिसके कारण कोई भी वेंटिलेटर युक्त बेड तत्काल उपलब्ध नहीं था। इस बीच परिजन बच्चे को गोरखपुर और लखनऊ के अन्य सरकारी एवं निजी अस्पतालों में लेकर गए, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बच्चे को वहां भर्ती नहीं किया जा सका।
अगले दिन सौभाग्यवश NICU में भर्ती एक अन्य नवजात की स्थिति में सुधार होने पर उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटाया गया, जिसके बाद वह वेंटिलेटर बेड उपलब्ध हो सका। इसके तुरंत बाद बच्चे को एम्स गोरखपुर में भर्ती कर गहन उपचार शुरू किया गया। तब तक बच्चे की हालत अत्यंत गंभीर हो चुकी थी। उसे सेप्टिक शॉक, सांस लेने में गंभीर तकलीफ, शरीर का तापमान कम होना, शुगर की कमी, एसिडोसिस, शरीर में लवण असंतुलन तथा दौरे जैसी गंभीर समस्याएं हो गई थीं। बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर सपोर्ट, एंटीबायोटिक्स, गहन उपचार एवं कई जीवनरक्षक दवाओं की आवश्यकता पड़ी।
बच्चे की गंभीर स्थिति के कारण उसे ऑपरेशन थिएटर तक ले जाना संभव नहीं था। इसलिए चिकित्सकों ने ICU के अंदर ही जीवनरक्षक ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।
यह सर्जरी डॉ. श्रेयस के. द्वारा डॉ. ऐश्वर्या की सहायता से की गई। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. अंकिता काबी ने किया, जबकि नियोनेटोलॉजी टीम का नेतृत्व डॉ. आंचला भारद्वाज ने किया। इस पूरे उपचार में विभागाध्यक्ष डॉ. महिमा मित्तल का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सहयोग रहा। साथ ही रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. शुभांगी, डॉ. पल्लवी, डॉ. शारिक, डॉ. प्रवीण तथा NICU स्टाफ ने भी अहम भूमिका निभाई।
ऑपरेशन के दौरान आंतों की सावधानीपूर्वक जांच कर एट्रेसिया की संभावना देखी गई, चिपकी हुई आंतों को अलग किया गया तथा धीरे-धीरे सभी आंतों को पेट के अंदर स्थापित कर पेट को सफलतापूर्वक बंद किया गया।
ऑपरेशन के बाद की स्थिति भी अत्यंत चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन लगातार गहन चिकित्सा एवं विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों से बच्चे की हालत धीरे-धीरे सुधरती गई। बाद में बच्चे को वेंटिलेटर एवं अन्य जीवनरक्षक दवाओं से हटाया गया, दूध पिलाना शुरू किया गया और अंततः बच्चा स्वस्थ होकर घर भेज दिया गया।
चिकित्सकों ने बताया कि यदि गर्भावस्था के दौरान इस प्रकार की जन्मजात बीमारी का पता चल जाए, तो प्रसव ऐसे केंद्र में करवाना चाहिए जहां NICU, पीडियाट्रिक सर्जरी एवं नवजात गहन चिकित्सा की समुचित सुविधा उपलब्ध हो, क्योंकि समय पर उपचार और समन्वित देखभाल ऐसे बच्चों की जान बचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
