वाराणसी
दो साल के अंदर 190 गर्भवतियों की मौत! स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल
समय पर इलाज न मिलने से बढ़ी मातृ मृत्यु दर, बीएचयू में 10 माह में 44 ने गंवाई जान
वाराणसी। जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में पिछले 22 महीनों के दौरान इलाज के दौरान 190 गर्भवती महिलाओं की मौत का मामला सामने आया है। इनमें कई महिलाएं समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकीं। जिला स्वास्थ्य समिति की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले बीएचयू में 50 से अधिक महिलाओं की मृत्यु दर्ज की गई, जिनमें से 10 महीनों में ही 44 महिलाओं ने दम तोड़ा। ग्रामीण क्षेत्रों में हालात अधिक गंभीर पाए गए, जहां आराजीलाइन, चिरईगांव और हरहुआ ब्लॉक में कुल 56 प्रतिशत मौतें दर्ज हुईं।
जिले के आठ ब्लॉकों के सरकारी व निजी अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी, जिला महिला अस्पताल और बीएचयू में हर महीने 2000 से अधिक गर्भवती महिलाओं का उपचार किया जा रहा है। समीक्षा में पिंडरा, चोलापुर, बड़ागांव और आराजीलाइन क्षेत्रों के अस्पतालों में लापरवाही सामने आई है, जहां समय पर उपचार न मिलने के कारण मातृ मृत्यु दर में वृद्धि हुई है।
चिरईगांव पीएचसी क्षेत्र के ग्राम पंचायत बराईं की 20 वर्षीय चांदनी (पत्नी अशोक राजभर) की प्रसव के बाद मौत का मामला जांच में लापरवाही से जुड़ा पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आशा और एक रिटायर्ड एएनएम द्वारा लालच में आकर निजी आवास पर असुरक्षित तरीके से डिलीवरी कराई गई, जिसके कुछ ही देर बाद प्रसूता की मृत्यु हो गई। 16 मार्च को प्रसव पीड़ा होने पर उसे सीएचसी नरपतपुर या पीएचसी ले जाने के बजाय डुबकियां बाजार स्थित निजी आवास पर ले जाया गया था।
दूसरे मामले में मिर्जामुराद थाना क्षेत्र के कछवा रोड स्थित एक क्लिनिक में 26 वर्षीय विनीता राय को पेट दर्द की शिकायत पर भर्ती कराया गया। परिजनों के अनुसार, दो दिन तक इलाज के बावजूद हालत में सुधार नहीं हुआ। स्थिति गंभीर होने पर उसे वाराणसी रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं की मृत्यु के पीछे अत्यधिक रक्तस्त्राव प्रमुख कारण के रूप में सामने आया है। जिला महिला अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अल्का सिंह के मुताबिक कई मामलों में यूट्रस ढीला पड़ने से स्थिति गंभीर हो जाती है और कभी-कभी जान बचाने के लिए यूट्रस निकालना पड़ता है। वहीं दीनदयाल एमसीएच विंग की डॉ. ज्योति ठाकुर ने बताया कि अत्यधिक ब्लीडिंग, उच्च रक्तचाप, संक्रमण और एनीमिया के साथ बार-बार गर्भधारण से प्रसव के दौरान जोखिम बढ़ जाता है।
ब्लॉकवार आंकड़ों में आराजीलाइन में 15, चोलापुर में 10, बड़ागांव में 9, चिरईगांव में 14, हरहुआ में 12, काशी विद्यापीठ में 11, पिंडरा में 12 और सेवापुरी में 11 मौतें दर्ज की गईं। इसके अतिरिक्त जिला महिला अस्पताल, एलबीएस रामनगर, अर्बन सीएचसी-पीएचसी, पीडीडीयू और बीएचयू में कुल 104 मौतें हुईं।
स्वास्थ्य विभाग के अपर निदेशक डॉ. एनडी शर्मा ने बताया कि ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों तक मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जागरूकता की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि महिलाओं का विवाह के दिन से ही स्वास्थ्य विभाग में पंजीकरण किया जाता है और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से कम उम्र में गर्भधारण से बचने की सलाह दी जाती है।
