शिक्षा
IIT BHU : वैज्ञानिकों ने अपशिष्ट जल से भारी धातुओं को हटाने की विकसित की नई जैविक तकनीक
मशरूम आधारित कम लागत वाली पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को मिला पेटेंट, स्वच्छ जल उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ी उपलब्धि
वाराणसी। Indian Institute of Technology (BHU) के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट जल से कैडमियम और सीसा जैसी विषैली भारी धातुओं को हटाने के लिए एक अभिनव और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है। इस तकनीक को हाल ही में पेटेंट भी प्राप्त हुआ है, जिसे जल प्रदूषण की समस्या से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
यह शोध कार्य एसोसिएट प्रोफेसर Dr. Vishal Mishra के नेतृत्व में उनके पीएच.डी. शोधार्थी Dr. Veer Singh द्वारा किया गया। इस शोध में University of Allahabad के प्रोफेसर Prof. Mohan P. Singh, Dr. Nidhi Singh तथा आईआईटी (बीएचयू) की प्रोफेसर Prof. Abha Mishra का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
शोधकर्ताओं ने अपने पूर्व शोध कार्य को आगे बढ़ाते हुए एक नई तकनीक विकसित की, जिसे पेटेंट (संख्या: 579217; आवेदन संख्या: 202411061819, दिनांक 29 जनवरी 2026) प्राप्त हुआ है। इस पेटेंट का शीर्षक “A Composition for Removal of Heavy Metal Ions from Wastewater and a Method Thereof” है।
यह तकनीक मशरूम प्रजाति Pleurotus citrinopileatus से प्राप्त फंगल बायोमास पर आधारित है, जो जल में मौजूद कई प्रकार की भारी धातुओं को अवशोषित कर उन्हें हटाने में सक्षम है। इस नवाचार के माध्यम से प्रदूषित जल को कम लागत में शुद्ध करने का एक प्रभावी और व्यावहारिक समाधान सामने आया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक साथ कई भारी धातुओं जैसे कैडमियम (Cd) और सीसा (Pb) को हटाने में सक्षम है। साथ ही इसमें बायोपॉलिमर का उपयोग कर अवशोषण क्षमता को और अधिक बढ़ाया गया है, जिससे यह तकनीक बड़े स्तर पर भी लागू की जा सकती है।
आज जल प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुकी है। World Health Organization (WHO) के अनुसार जल जनित बीमारियों के कारण हर वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु होती है। वहीं UNICEF के आंकड़ों के अनुसार दूषित जल के सेवन से प्रतिदिन हजारों बच्चों की जान जाती है। भारत में भी कई जिलों में लोग ऐसे जल का उपयोग करने को मजबूर हैं, जिसमें आर्सेनिक, सीसा और कैडमियम जैसी विषैली धातुओं की मात्रा अधिक पाई जाती है।
इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए Prof. Amit Patra, निदेशक, Indian Institute of Technology (BHU) ने कहा कि यह नवाचार संस्थान की वैज्ञानिक प्रतिबद्धता और समाज के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक के माध्यम से अपशिष्ट जल को शुद्ध करना स्वच्छ और सुरक्षित जल उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां संसाधनों की कमी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में जल शोधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और ग्रामीण तथा विकासशील क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध होगी।
