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वाराणसी

‘मयंक’ बने मानवाधिकार CWA संगठन के प्रांत मीडिया प्रभारी ‘हर्ष’

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मानवाधिकार उल्लंघन और पत्रकारिता- ‘मयंक कुमार’

रिपोर्ट – प्रदीप कुमार

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वाराणसी: यूपी के वाराणसी जिले से युवा पत्रकार मयंक कुमार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व जॉइंट रजिस्ट्रार लॉ अनिल परासर के निर्देश पर मानवाधिकार CWA संगठन के काशी प्रांत मीडिया प्रभारी पद पर नियुक्त किया गया है। संगठन के चेयरमैन योगेंद्र सिंह ‘योगी’ द्वारा संगठन का नियुक्ति पत्र देकर यह आशा जताई गई कि जिस प्रकार से मयंक पूरी मेहनत और लगन से पत्रकारिता के क्षेत्र में निष्पक्ष खबर लिखकर समाज के बीच निडर व चर्चित पत्रकार है। उसी प्रकार से मानवाधिकार संगठन के लिए भी पूरी मेहनत और लगन के साथ कार्य करेंगे।मीडिया से बातचीत के दौरान मयंक ने बताया कि देश में मीडिया का काम सत्ता पर नजर रखना, उसकी मनमानी पर अंकुश लगाने की कोशिश करना, उसके गलत कार्यों को जनता के सामने लाना भी है। मानवाधिकार संरक्षण का वह महत्वपूर्ण कारक है। हालाँकि यह भी सही है कि मानवाधिकार खुद मीडिया के लिए भी जरूरी है। अगर मानवाधिकारों की स्थिति अच्छी नहीं है तो मीडिया को भी स्वतंत्र रूप से कार्य करने में दिक्कत होती है। यद्यपि ऐसी परिस्थिति में मीडिया की असली परीक्षा होती है। ऐसी भी मिसालें अनेक हैं जिनमें जटिल परिस्थितियों में मानवाधिकारों के हनन के बीच नुकसान सहकर भी मीडिया ने अपना दायित्व निभाया और मानवाधिकार बहाली में भी सफल योगदान दिया।पत्रकारिता का पेशा ही ऐसा है कि अक्सर पत्रकारों को मानवाधिकार हनन की स्थिति का सामना करना पड़ जाता है। भारत जैसे देश में, जहाँ पर अब भी सामंतवादी मूल्य जड़ें जमाए बैठे हैं, वहाँ तो यह अक्सर ही होता है। छोटे शहरों, गांवों, आदिवासी अंचलों में तो स्थिति खराब है ही, पर बड़े शहरों में भी मानवाधिकार हनन के मामले लगातार सामने आते रहते हैं। मानवाधिकारों की रिपोर्टिंग के लिए उतनी ही लगन और ईमानदारी की जरूरत होती है जितनी कि अन्य किसी भी गंभीर विषय की, बल्कि संवेदनशीलता को देखते हुए पत्रकारों को कुछ अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत होती है। उन्हें संभावित खतरों को भी ध्यान में रखना होता है, और यह भी समझना होता है कि संकटग्रस्त क्षेत्र में दुनिया को जानकारी उन्हीं की कलम के जरिए होने वाली है। ऐसे में किसी भी तरह की चूक या पूर्वाग्रह दुनिया को भ्रमित करने के कारण हो सकते हैं। इस तरह की खबरें निकालते समय पत्रकारों को अपने सूत्रों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए। पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों से बात करना और उनका इंटरव्यू लेना पत्रकार के लिए बहुत ज़रूरी हो जाता है। यह कोशिश करनी चाहिए कि पीड़ितों से या अन्य सूत्रों से बात यथासंभव अकेले में की जाए। समूह में अक्सर लोग सही बात बता पाने में समर्थ नहीं होते या बहुधा बढ़ा-चढ़ाकर घटनाओं का वर्णन करने लगते हैं। उन्हें पत्रकार न्याय का साधन लगने लगते हैं, इसलिए वो हर हाल में दूसरे पक्ष की कारगुजारियों को ज्यादा बढ़ाचढ़ाकर बताने लगते हैं और अपने साथ हुए अत्याचार की घटनाओं को भी बढ़ाचढ़ाकर बताने लगते हैं। बेहतर हो, कि आप उन्हें वास्तविकता से परिचित कराएँ, जिसकी शुरुआत आप अपने और अपने संगठन के सही परिचय से करें। किसी तरह की अव्यावहारिक आशाएँ उनके मन में पैदा न करें। अगर पीड़ितों के मन में कुछ डर है तो उनके डर को समझने की जरूरत है क्योंकि उन्हें वहाँ वहीं की परिस्थितियों में आगे भी रहना है और हर समय या कभी भी आप उनकी मदद के लिए वहाँ नहीं रहने वाले। ऐसे में आपको वैकल्पिक सूत्रों की तलाश करनी चाहिए या पीड़ितों के नाम छिपाने का इंतजाम करना चाहिए। ऐसी कठिन स्थिति में पीड़ित से जितनी जानकारी हो सके, एक बार में ही ले लेनी चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि आपकी उससे मुलाकात बार-बार संभव नहीं हो सकेगी।

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