वाराणसी
ऑपरेशन के बाद महिला की मौत, मामले की जांच शुरू
वाराणसी। आइएमएस बीएचयू के ट्रामा सेंटर में कथित लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें एक ही नाम की दो महिला मरीजों के बीच भ्रम के चलते गलत विभाग में सर्जरी किए जाने का आरोप है। घटना के करीब पंद्रह दिन बाद महिला की मौत हो जाने पर प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं। गठित कमेटी को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
बलिया निवासी मृत्युंजय पाल के अनुसार, उनकी दादी राधिका देवी को स्पाइनल कार्ड ट्यूमर के उपचार के लिए 25 फरवरी 2026 को न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रो. अनुराग साहू की यूनिट में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि सात मार्च को अस्पताल में एक ही नाम की दो मरीज भर्ती थीं, जिनमें एक न्यूरो सर्जरी और दूसरी आर्थोपेडिक विभाग में थी। नाम की समानता के कारण न्यूरो सर्जरी की मरीज को गलती से आर्थोपेडिक विभाग में भेज दिया गया, जहां बिना सही पहचान सुनिश्चित किए ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
गलत प्रक्रिया के बाद राधिका देवी की हालत लगातार बिगड़ती गई। उन्हें सांस लेने में दिक्कत, जबड़े में कंपन और मुंह में छाले जैसी समस्याएं होने लगीं। 18 मार्च को न्यूरो सर्जरी विभाग में दोबारा ऑपरेशन किया गया, लेकिन स्थिति गंभीर बनी रही और बीते 27 मार्च की सुबह कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई। परिजनों ने इलाज में देरी और अस्पताल स्टाफ के दुर्व्यवहार के भी आरोप लगाए हैं।
मामले की जांच के लिए आर्थोपेडिक विभाग के प्रो. अजीत सिंह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की गई है। इसमें दंत चिकित्सा विज्ञान संकाय के प्रो. अजीत विक्रम परिहार और न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रो. आरएस प्रसाद को शामिल किया गया है। यह समिति ऑपरेशन थिएटर की प्रक्रियाओं और मरीज की पहचान से जुड़ी व्यवस्थाओं की समीक्षा करेगी और यह स्पष्ट करेगी कि घटना केवल नाम के भ्रम का परिणाम थी या सिस्टम की किसी गहरी खामी का संकेत।
आइएमएस निदेशक एसएन संखवार ने बताया कि एक अप्रैल को शिकायत मिलने के बाद प्रारंभिक जांच के लिए डा. अमित रस्तोगी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई थी। चूंकि आरोप उनकी ही टीम पर लगे थे, इसलिए उनके अनुरोध पर समिति का पुनर्गठन किया गया। नई कमेटी एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपेगी, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
चिकित्सा मानकों के अनुसार, मरीज को वार्ड से ऑपरेशन थिएटर तक ले जाने की प्रक्रिया में कई स्तरों पर पहचान की पुष्टि की जाती है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि वार्ड स्टाफ, नर्स, एनेस्थीसिया टीम और सर्जन द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन क्यों नहीं किया गया।
वहीं, आर्थोपेडिक विभाग के प्रो. अमित रस्तोगी ने सफाई देते हुए कहा कि यह घटना एक ही नाम के दो मरीज होने के कारण हुई गलतफहमी का परिणाम है। उनके अनुसार, जब मरीज को ऑपरेशन थिएटर में लाया गया तो कागजात और नाम मेल खाते थे, जिससे संदेह नहीं हुआ। प्रक्रिया शुरू होने के दौरान मशीनों से जांच में स्थिति अलग मिलने पर इसे तत्काल रोक दिया गया। उन्होंने बताया कि केवल एक छोटा चीरा लगाया गया था, जिसे बाद में टांका लगाकर बंद कर दिया गया और मरीज को न्यूरो सर्जरी विभाग भेज दिया गया।
