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वाराणसी

उपेक्षा की शिकार हो रही महादेव की नगरी, एनजीटी ने किया खुलासा

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महादेव की नगरी काशी जिसे वरुणा और असी नदियों के संगम से वाराणसी नाम मिला आज अपनी उपेक्षा का शिकार हो रही है। एनजीटी की रिपोर्ट के अनुसार गंगा का जल आचमन योग्य नहीं है और अब वाराणसी की वरुणा नदी भी गंभीर संकट में है।

एक समय इस नदी को टेम्स नदी से तुलना की जाती थी लेकिन आज इसका पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि इसे छूने तक की हिम्मत नहीं होती। नदी का पानी काले सीवर के पानी से घुलकर गंदगी और दुर्गंध से भर गया है और इसके किनारे बसे गांवों के किसान अब इससे सिंचाई कर रहे हैं जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।

वरुणा के पानी में मानक से अधिक जिंक, क्रोमियम, मैग्नीज, कैडमियम और अन्य जहरीले तत्व मिल गए हैं जिससे वहां उगने वाली सब्जियां भी खाने योग्य नहीं रह गई हैं। इसके बावजूद नदी के पुनर्जीवन के लिए की गई पहल जैसे कि 2016 में 201 करोड़ की लागत से बनाए गए वरुणा कॉरिडोर केवल कागजी घोड़े बनकर रह गए हैं। जगह-जगह से रेलिंग उखड़ी हुई हैं और पाथवे के पत्थर भी टूट चुके हैं। गंदगी और जलकुंभी से नदी का पानी पूरी तरह से ठहर चुका है।

राजनीतिक खींचतान और कागजी योजनाओं के बीच नदी का अस्तित्व खतरे में है। समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप के चलते इस परियोजना की गति धीमी पड़ गई है और डेनमार्क से आई टीम भी बाद में इस परियोजना से हाथ खींच चुकी है। वरुणा नदी का इतिहास बहुत पुराना है और यह गंगा से भी प्राचीन मानी जाती है लेकिन आज इसके अस्तित्व को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

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हालांकि वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अरुण सक्सेना का दावा है कि महाकुंभ से पहले गंगा और उसकी सहायक नदियों का जल स्वच्छ और पीने योग्य बना दिया जाएगा लेकिन फिलहाल तो वरुणा का हाल बेहाल है।

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