वाराणसी
कड़ी सुरक्षा के बीच अगहनी जुमा की नमाज़ संपन्न
मुस्लिम बंधुओ ने अल्लाह से मांगी कौम और देश की खुशहाली की दुआ
वाराणसी। जनपद में आज पुरानापुल पुल्कोहना स्थित ईदगाह में सदियों पुरानी परंपरा के तहत अगहनी जुमे की नमाज़ अदा की गई। इस अवसर पर बुनकर बिरादराना तंज़ीम बाईसी के सरदार हाजी हाफिज मोइनुद्दीन उर्फ कल्लू हाफिजी ने इस विशेष नमाज़ की अध्यक्षता की।
सरदार हाफिज मोइनुद्दीन ने बताया कि यह परंपरा लगभग 460 साल पुरानी है। उस समय देश में अकाल और आर्थिक संकट के दौर में बुनकरों और किसानों ने मिलकर ईदगाह में नमाज़ अदा कर अल्लाह से बारिश और खुशहाली की दुआ मांगी थी। अल्लाह के करम से बारिश हुई, जिससे किसानों और बुनकरों के हालात सुधर गए। तब से इस परंपरा को हर साल अगहन महीने में निभाया जाता है।

बुनकर बिरादराना तंज़ीम बावनी के सदस्य फैसल महतो ने इस परंपरा को गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रकट करता है, बल्कि आपसी भाईचारे और सामुदायिक सहयोग का प्रतीक भी है।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल
इस मौके पर सरदार हाशिम अंसारी ने कहा कि बुनकर समाज ने हमेशा गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश की है। बुनकरी के पेशे में हिंदू और मुस्लिम भाई मिलकर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि अगहनी जुमे की नमाज़ के बाद बुनकर भाई किसानों द्वारा उगाए गए गन्ने की खरीदारी करते हैं, जिसे स्थानीय हिंदू व्यापारी बेचते हैं। यह आपसी सहयोग और सद्भाव का जीता-जागता उदाहरण है।

मौलाना जहिर साहब का संदेश
मौलाना जहिर साहब ने तकरीर के दौरान आपसी मोहब्बत और भाईचारे को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने कहा, “मोहब्बत ही वह धागा है, जो समाज को एकजुट रखता है।” उन्होंने देश की तरक्की, रोजगार, बीमारी से निजात, सादगी भरी शादी और सभी के लिए सुख-शांति की दुआ की।
विशेष अतिथियों की उपस्थिति
इस आयोजन में बुनकर बिरादराना तंजीम बाईसी, बावनी, बारहों, चौतीसो और पांचों की तंजीम के काबीना सदस्यों ने हिस्सा लिया। प्रमुख अतिथियों में पूर्व सरदार गुलाम मोहम्मद उर्फ दरोगा, हाजी बाबू, हाजी तुफैल, पार्षद हाजी ओकास अंसारी, डॉ. इम्तियाजुद्दीन, हाजी नईम, हाफिज नसीर और अन्य गणमान्य शामिल थे।

स्वच्छता और व्यवस्था
ईदगाह की सफाई व्यवस्था क्षेत्रीय पार्षद जितेंद्र कुशवाहा ने सुनिश्चित की, जबकि पार्षद हाजी ओकास अंसारी ने सभी मेहमानों का स्वागत किया।
इस आयोजन ने न केवल एक धार्मिक परंपरा को जीवित रखा बल्कि सामुदायिक एकता और आपसी सद्भाव के महत्व को भी दोहराया।
